### वर्दी की गरिमा, सरकारी पहचान और निजी प्रचार के बीच उलझता पुलिस महकमा

संपादकीय | पुलिस प्रहरी

सरकारी विभागों के साइन बोर्ड किसी दुकान या निजी प्रतिष्ठान के विज्ञापन पट्ट नहीं होते। वे विभाग की पहचान, उसकी गरिमा और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही के प्रतीक होते हैं। खासकर पुलिस विभाग का बोर्ड केवल किसी कार्यालय का नाम बताने वाला साधन नहीं, बल्कि कानून, अनुशासन, सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था का सार्वजनिक चेहरा होता है। ऐसे में जब पुलिस कार्यालयों के नामपट्टों पर निजी कंपनियों के प्रचार और विज्ञापन प्रमुखता से दिखाई देने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकारी पहचान और निजी कारोबार के बीच यह तालमेल किस आधार पर बनाया जा रहा है?

कानपुर में पुलिस कार्यालय के बाहर लगे साइन बोर्ड की तस्वीर इसी विषय पर विचार करने को मजबूर करती है। बोर्ड पर पुलिस उपायुक्त कार्यालय की पहचान के साथ मसालों के ब्रांड का प्रचार भी दिखाई देता है। सवाल किसी खास कंपनी के विज्ञापन से व्यक्तिगत विरोध का नहीं, बल्कि सरकारी संस्थानों की गरिमा और उनके सार्वजनिक स्वरूप का है।

### क्या सरकारी बोर्ड अब निजी प्रचार का माध्यम बनते जा रहे हैं?

आज प्रतिस्पर्धा के दौर में कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार के लिए नए-नए माध्यम तलाशती हैं। लेकिन जब किसी सरकारी कार्यालय की पहचान वाले बोर्ड पर व्यावसायिक प्रचार को जगह मिलती है, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि इसके पीछे क्या व्यवस्था है। क्या यह बोर्ड किसी कंपनी ने बनवाकर उपलब्ध कराया है? क्या इसके लिए कोई औपचारिक अनुमति दी गई है? क्या विज्ञापन के बदले विभाग को कोई सुविधा मिलती है? और यदि ऐसा है, तो क्या इसकी कोई लिखित नीति या पारदर्शी प्रक्रिया है?

इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग को स्पष्ट करना चाहिए। केवल तस्वीर देखकर किसी अधिकारी या कर्मचारी पर अनियमितता का आरोप लगाना उचित नहीं होगा, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े सवालों को अनदेखा करना भी सही नहीं है।

### पुलिस की पहचान बड़ी या कंपनी का ब्रांड?

पुलिस का नाम जनता के विश्वास से जुड़ा होता है। थाने, चौकी और वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यालयों पर लगे बोर्ड नागरिकों को बताते हैं कि वे कानून-व्यवस्था से संबंधित किस सरकारी संस्था के परिसर में खड़े हैं। ऐसे स्थानों पर निजी उत्पादों के बड़े-बड़े विज्ञापन सरकारी पहचान को पीछे छोड़ते दिखाई दें, तो संस्थागत गरिमा पर बहस होना लाजिमी है।

यह भी विचारणीय है कि क्या सरकारी विभागों को अपने साइन बोर्ड बनवाने के लिए निजी कंपनियों की ओर देखना पड़ रहा है? यदि बजट की कमी है, तो उसका समाधान निर्धारित बजट, अधिकृत खरीद प्रक्रिया या पारदर्शी प्रायोजन नीति से निकाला जाना चाहिए। सरकारी पहचान के साथ विज्ञापन जोड़ना कोई सामान्य निर्णय नहीं है, इसके लिए स्पष्ट नियम और जवाबदेही आवश्यक हैं।

### व्यवस्था स्पष्ट हो, ताकि सवालों पर विराम लगे

पुलिस विभाग को चाहिए कि अपने कार्यालयों, थानों और चौकियों पर लगे सभी साइन बोर्डों की समीक्षा करे। जहां निजी विज्ञापन प्रदर्शित किए जा रहे हैं, वहां उनकी अनुमति, उद्देश्य और नियमों की स्थिति स्पष्ट की जाए। यदि विज्ञापन नियमानुसार हैं, तो संबंधित नीति सार्वजनिक की जाए। यदि वे निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हैं, तो आवश्यक सुधार किया जाए।

यह मुद्दा किसी एक बोर्ड या एक कार्यालय तक सीमित नहीं है। यह सरकारी संस्थानों की पहचान, सार्वजनिक धन के उपयोग और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा विषय है।

पुलिस की पहचान उसकी वर्दी, अनुशासन, कार्यशैली और जनता के प्रति सेवा-भाव से होती है—किसी मसाला कंपनी, निजी ब्रांड या व्यावसायिक विज्ञापन से नहीं।

सरकारी बोर्ड पर सबसे पहले सरकारी संस्था का नाम, उसकी पहचान और उसकी गरिमा दिखाई देनी चाहिए। निजी प्रचार को स्थान देने के संबंध में नियम स्पष्ट होने चाहिए, ताकि जनता के मन में अनावश्यक सवाल न उठें।

आखिर पुलिस कार्यालय कोई व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं है। वहां लगा साइन बोर्ड जनता को व्यवस्था का भरोसा दिलाने के लिए होता है, किसी उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए नहीं।

— संपादक की कलम से सूर्य नारायण पाण्डेय पुलिस प्रहरी