BREAKING
बांग्लादेश में बीएनपी की जीत को विदेशी मीडिया भारत के लिए कैसे देख रहा है? - BBC | नए 'पावर सेंटर' सेवा तीर्थ-कर्तव्य भवन की डिजाइन में क्या है खास? साउथ-नॉर्थ ब्लॉक से कितना अलग - AajTak | ईरान की ओर चल पड़ा अमेरिका का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर, तनाव के बीच ट्रंप का बड़ा फैसला - Hindustan | राहुल गांधी के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन का नोटिस नहीं देगी भाजपा, प्रियंका गांधी क्या बोलीं - BBC | New Labour Codes से बढ़ेगा आपका वेतन? जानिए इंडस्ट्री एचआर हेड क्या कह रहे हैं - Navbharat Times
Home /देश

देश में लागू हो रहे यूजीसी के नए नियम: समानता या नया विवाद

टीम पुलिस प्रहरी सूर्या 11 फ़रवरी 2026

देश में लागू हो रहे यूजीसी के नए नियम: समानता या नया विवाद

समीक्षात्मक लेख
विषय: देश में लागू हो रहे यूजीसी के नए नियम – समानता या नया विवाद?
भारत में उच्च शिक्षा का नियमन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा किया जाता है। वर्ष 2026 में यूजीसी ने “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” लागू करने की घोषणा की, जो 2012 के पुराने नियमों का स्थान लेने वाले हैं। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, वर्ग, लिंग और अन्य आधारों पर होने वाले भेदभाव को रोकना तथा समान अवसर सुनिश्चित करना है। हालांकि इन नियमों को लेकर देशभर में समर्थन और विरोध दोनों देखने को मिल रहे हैं।
नए नियमों के अनुसार प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज में “Equal Opportunity Centre” और “Equity Committee” स्थापित करने का प्रावधान है। इसके साथ ही ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और हेल्पलाइन की व्यवस्था भी की जाएगी ताकि छात्र भेदभाव से संबंधित शिकायतें दर्ज करा सकें। यूजीसी का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में भेदभाव से जुड़े मामलों में वृद्धि हुई है, इसलिए सख्त और स्पष्ट नियमों की आवश्यकता महसूस की गई।
इन नियमों के समर्थकों का मानना है कि यह कदम सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण है। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), दिव्यांग और अन्य वंचित वर्गों के छात्रों को इससे सुरक्षा और न्याय मिलेगा। उच्च शिक्षा संस्थानों में समावेशन और समानता का वातावरण बनेगा तथा संस्थानों की जवाबदेही भी बढ़ेगी।
दूसरी ओर, इन नियमों की आलोचना भी हो रही है। कुछ छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों का कहना है कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इससे अनावश्यक विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। आलोचकों का यह भी तर्क है कि शिकायत प्रणाली का दुरुपयोग संभव है और इससे शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो सकता है। कुछ लोग इसे पहचान-आधारित विभाजन को बढ़ावा देने वाला कदम भी बता रहे हैं।
मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है और अदालत ने फिलहाल इन नियमों पर अंतरिम रोक लगाते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। न्यायालय का कहना है कि किसी भी नीति को लागू करने से पहले उसकी संवैधानिक वैधता और व्यावहारिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
इस पूरे विवाद ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है—क्या शिक्षा में समानता सुनिश्चित करने के प्रयास अनजाने में नए प्रकार के मतभेद पैदा कर सकते हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा नीति में संतुलन, पारदर्शिता और व्यापक परामर्श आवश्यक है। केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका निष्पक्ष और स्पष्ट क्रियान्वयन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यूजीसी के नए नियम समानता और समावेशन की दिशा में एक प्रयास हैं, परंतु इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार, न्यायपालिका और शैक्षणिक संस्थान मिलकर कितनी पारदर्शिता और संतुलन के साथ इन्हें लागू करते हैं। शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, अवसर और समानता प्रदान करना है, इसलिए किसी भी नीति को इसी कसौटी पर परखा जाना