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प्राण केवल श्वसन नहीं बल्कि वह ब्रम्हांडीय ऊर्जा है

टीम पुलिस प्रहरी
1 महीने पहले
प्राण केवल श्वसन नहीं बल्कि वह ब्रम्हांडीय ऊर्जा है

प्राण विज्ञान एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरा विषय है। भारतीय योग परंपरा के अनुसार, प्राण केवल श्वसन (breathing) नहीं है, बल्कि वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा है जो जड़ और चेतन—दोनों में व्याप्त है।
1. *प्राण विज्ञान क्या है?*
प्राण विज्ञान वह विद्या है जिसके माध्यम से हम शरीर के भीतर बहने वाली सूक्ष्म जीवनी शक्ति (Vital Force) को समझते और उसे नियंत्रित करते हैं। 'प्राण' का अर्थ है जीवन शक्ति और 'आयाम' का अर्थ है विस्तार। इसलिए, प्राणायाम के माध्यम से इस शक्ति का नियमन किया जाता है।
2. *प्राण के प्रकार और उनके कार्य*
योग शास्त्र के अनुसार, शरीर में मुख्य रूप से पांच प्राण (पंच प्राण) कार्य करते हैं।
ये शरीर के अलग-अलग हिस्सों में स्थित होते हैं और विशिष्ट जैविक व आध्यात्मिक कार्य करते हैं:

*प्राण का नाम,शरीर में स्थान,मुख्य कार्य का वर्णन - - -*
*प्राण*
स्थान - हृदय और श्वसन तंत्र
कार्य - श्वास लेना, हृदय की गति और संवेदी अंगों को ऊर्जा देना।
*अपान*
स्थान - नाभि के नीचे (पेल्विक क्षेत्र)
कार्य - मल-मूत्र त्याग, प्रजनन और शरीर से विजातीय तत्वों को बाहर निकालना।
*समान*
स्थान - नाभि के पास (जठराग्नि)
कार्य - भोजन का पाचन, रस बनाना और शरीर में ऊर्जा का संतुलन। |
उदान कंठ (गला) और मस्तिष्क कार्य - बोलना, निगलना, विचार शक्ति और मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर को बाहर ले जाना।
*व्यान*
स्थान - पूरे शरीर में व्याप्त
कार्य - रक्त संचार, तंत्रिका तंत्र का संचालन और शरीर की गतिशीलता। |

3. *योग और प्राण का संबंध*
योग और प्राण का अटूट संबंध है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, जब तक प्राण गतिशील है, तब तक चित्त (मन) भी चंचल रहता है।
* *हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है:* "चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्" (जब प्राण चलता है, तो मन भी चलता है; जब प्राण स्थिर होता है, तो मन भी स्थिर हो जाता है)।
* योग का मुख्य उद्देश्य चित्त की वृत्तियों का निरोध करना है, और इसे प्राप्त करने का सबसे प्रभावी मार्ग प्राण पर नियंत्रण है।
4. *अष्टांग योग और प्राण विज्ञान*
महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग में आठ अंग बताए हैं। इसमें 'प्राण' का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है:
* यम (सामाजिक अनुशासन)
* नियम (व्यक्तिगत अनुशासन)
* आसन (शारीरिक स्थिरता)
* प्राणायाम (प्राण का आयाम/विस्तार) - यही प्राण विज्ञान का केंद्र है।
* प्रत्याहार (इंद्रियों का अंतर्मुखी होना)
* धारणा (एकाग्रता)
* ध्यान (निरंतर चिंतन)
* समाधि (परमात्मा से मिलन)
पतंजलि के अनुसार प्राणायाम का महत्व:
पतंजलि कहते हैं कि आसन की सिद्धि के बाद 'श्वास-प्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः' अर्थात् श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना ही प्राणायाम है। जब हम प्राण को साध लेते हैं, तो बुद्धि पर छाया हुआ अज्ञान का पर्दा हट जाता है और मन 'धारणा' के योग्य हो जाता है।
निष्कर्ष
_प्राण ही वह सेतु है जो स्थूल शरीर को सूक्ष्म मन से जोड़ता है।_ आपके विषय " *प्राण ही परमात्मा है"* के अनुसार, जब साधक प्राणायाम के माध्यम से अपने भीतर के इन पांचों प्राणों को संतुलित कर लेता है, तो वह आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है।
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*_पतंजलि योग शास्त्र और हठयोग के ग्रंथों (जैसे हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता) के अनुसार,_ प्राणों पर नियंत्रण पाने के लिए मुख्य रूप से तीन क्रियाओं का उपयोग किया जाता है: *कुंभक (प्राणायाम), बंध (शारीरिक ताले), और मुद्राएं।*
यहाँ पंच प्राणों को जाग्रत करने की चरणबद्ध प्रक्रिया दी गई है:
१. *प्रथम चरण:* 'समान प्राण' की जाग्रति (नाभि केंद्र)
समान प्राण नाभि में स्थित होता है और पाचन व ऊर्जा संतुलन के लिए जिम्मेदार है। यह योग साधना का आधार है क्योंकि यह जठराग्नि को तीव्र करता है।
* *उद्देश्य:* शरीर की सभी ऊर्जाओं को केंद्र (नाभि) में एकत्रित करना।
* *विधि (कुंभक):* भस्त्रिका प्राणायाम (लोहार की धौंकनी की तरह तेज श्वास-प्रश्वास)। यह तेज घर्षण पैदा करता है जिससे समान प्राण सक्रिय होता है।
* *सहायक क्रियाएं:* अग्निसार क्रिया (पेट को बार-बार अंदर-बाहर करना) जठराग्नि को उत्तेजित करती है और समान प्राण को गति देती है।
२. *द्वितीय चरण:* 'अपान' और 'प्राण' का मिलन (हृदय और मूलाधार)
यह योग की सबसे महत्वपूर्ण सूक्ष्म क्रियाओं में से एक है। सामान्यतः प्राण (हृदय में) ऊपर की ओर और अपान (मूलाधार में) नीचे की ओर बहता है। योग का उद्देश्य इन्हें एक-दूसरे की ओर मोड़कर नाभि केंद्र पर मिलाना है।
* *उद्देश्य:* अपान (नीचे बहने वाली ऊर्जा) को ऊपर उठाना और प्राण (ऊपर बहने वाली ऊर्जा) को नीचे लाना।
* *विधि (कुंभक):* नाड़ी शोधन प्राणायाम (नाड़ी शुद्धि)। यह प्राण और अपान के प्रवाह को संतुलित करता है। जब श्वास रोकते हैं (कुंभक), तब इन दोनों का मिलन होता है।
* सहायक क्रियाएं (बंध):
* *मूल बंध:* गुदा मार्ग और पेल्विक फ्लोर को संकुचित करना। यह अपान प्राण के अधोमुखी प्रवाह को रोकता है और उसे ऊपर की ओर मोड़ता है।
* *उड्डीयान बंध:* पेट को पूरी तरह अंदर खींचकर नाभि को रीढ़ की हड्डी से लगाने का प्रयास। यह समान प्राण को संपीड़ित करता है और अपान को और ऊपर धकेलता है।
३. *तृतीय चरण:* 'उदान प्राण' की जाग्रति (कंठ और मस्तिष्क)
जब प्राण, अपान और समान नाभि केंद्र पर मिल जाते हैं, तो ऊर्जा ' *सुषुम्ना नाड़ी' (केंद्र रीढ़)* के माध्यम से ऊपर उठने लगती है। इस ऊर्जा को कंठ से होकर मस्तिष्क तक ले जाने का कार्य 'उदान प्राण' करता है।
* *उद्देश्य:* ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी (ऊपर की ओर) बनाना।
* *विधि (कुंभक):* उज्जायी प्राणायाम (गले से घर्षण करते हुए श्वास लेना)। यह कंठ में कंपन पैदा करता है जिससे उदान सक्रिय होता है।
* सहायक क्रियाएं (बंध/मुद्रा):
* *जालंधर बंध:* ठोड़ी को छाती (कंठ कूप) से लगाना। यह ऊपर उठती ऊर्जा को मस्तिष्क में जाने से पहले थोड़ी देर रोककर उसका नियमन करता है।
* *खेचरी मुद्रा:* जीभ को पीछे की ओर मोड़कर तालु के ऊपर ले जाना। यह उदान प्राण को स्थिर करता है और मन की चंचलता को रोकता है।
४. *चतुर्थ चरण:* 'व्यान प्राण' का विस्तार (संपूर्ण शरीर)
जब ऊर्जा ऊर्ध्वगामी हो जाती है और कंठ से ऊपर उठती है, तब यह सूक्ष्म रूप धारण कर लेती है। 'व्यान प्राण', जो पूरे शरीर में व्याप्त है, अब इस सूक्ष्म ऊर्जा को शरीर की प्रत्येक कोशिका और चेतना के हर स्तर तक फैलाता है।
* *उद्देश्य* : जाग्रत ऊर्जा को शरीर की प्रत्येक कोशिका में फैलाना और आभा (Aura) का विस्तार करना।
* *विधि (मुद्रा):* महायोनि मुद्रा (या शांभवी मुद्रा)। जब साधक सभी इंद्रियों को अंतर्मुखी कर लेता है और ध्यान की गहराइयों में उतरता है, तब व्यान प्राण शरीर के चारों ओर एक सूक्ष्म, शक्तिशाली क्षेत्र बना लेता है।
* *अनुभव* : इस अवस्था में साधक को अपने शरीर की सीमाओं का अनुभव कम होता है और वह एक व्यापक, चेतन स्वरूप महसूस करता है।
*महत्वपूर्ण चेतावनी:*
ये सभी क्रियाएं, विशेष रूप से उच्च कुंभक और बंध, अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली हैं।
इन्हें किसी योग्य और सिद्ध गुरु के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में ही सीखा और अभ्यास किया जाना चाहिए। गलत अभ्यास से शारीरिक और मानसिक हानि हो सकती है।
शक्ति साधक आचार्य डॉ. कश्यप
परा मानसिक एवं सूक्ष्म विज्ञान विशेषज्ञ

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