कानपुर के रंगमंच से निकले अभिनेता ने ‘मिर्जापुर’, ‘रात अकेली है’ समेत कई चर्चित फिल्मों और वेब सीरीज में निभाई महत्वपूर्ण भूमिकाएं
कानपुर। रंगमंच किसी भी कलाकार के अभिनय की सबसे मजबूत पाठशाला माना जाता है। कानपुर के रंगमंच से लंबे समय से जुड़े अभिनेता मुक्तेश्वर ओझा ने अपनी अभिनय यात्रा को बड़े पर्दे और ओटीटी तक पहुंचाकर शहर की सांस्कृतिक पहचान को भी नई मजबूती दी है। वर्ष 1985 से रंगमंच से जुड़े मुक्तेश्वर ओझा ने अलग-अलग किरदारों के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
मुक्तेश्वर ओझा का अभिनय सफर केवल रंगमंच तक सीमित नहीं रहा। ऑनलाइन उपलब्ध फिल्म डेटाबेस के अनुसार उन्होंने वर्ष 2017 में फिल्म ‘Sai V/S I’ से फिल्म जगत में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों और वेब सीरीज में काम किया। � 
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‘मिर्जापुर’ में बने देव़रिया बाहुबली
मुक्तेश्वर ओझा की चर्चित भूमिकाओं में वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ का किरदार देवरिया बाहुबली विशेष रूप से उल्लेखनीय है। IMDb के क्रेडिट में उनका नाम देवरिया बाहुबली के रूप में दर्ज है। इस भूमिका ने उन्हें ओटीटी दर्शकों के बीच खास पहचान दिलाई। �
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इसके अलावा उन्होंने ‘रात अकेली है’ में टेनरी फोरमैन, ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ में रूपराम तथा अन्य फिल्मों और वेब प्रोजेक्ट्स में अलग-अलग किरदार निभाए हैं। उनके अभिनय की खासियत यह है कि वे छोटे लेकिन प्रभावशाली किरदारों में भी अपनी अलग छाप छोड़ते हैं।
‘हनुमान अंश’ में रेलवे गार्ड की भूमिका
हाल ही में रिलीज हुई आध्यात्मिक फिल्म ‘हनुमान अंश’ में भी मुक्तेश्वर ओझा दिखाई दिए हैं। फिल्म भगवान हनुमान के भक्त और संत नीम करोली बाबा के जीवन एवं विचारों से प्रेरित है। फिल्म के कलाकारों की उपलब्ध सूचियों में मुक्तेश्वर ओझा का नाम भी शामिल है। �
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आपके उपलब्ध विवरण के अनुसार फिल्म में उन्होंने रेलवे गार्ड की भूमिका निभाई है। यह भूमिका उनके अभिनय के विविध रंगों को सामने लाती है।
रंगमंच आज भी आधार
मुक्तेश्वर ओझा की यात्रा यह बताती है कि रंगमंच कलाकार को केवल संवाद बोलना नहीं, बल्कि किरदार को जीना सिखाता है। लंबे समय तक थिएटर से जुड़े रहने के बाद फिल्मों और ओटीटी में सक्रिय होना उनकी निरंतर मेहनत और अभिनय के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
कानपुर जैसे शहर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर की फिल्मों और वेब सीरीज तक पहुंचने वाले कलाकारों की सफलता शहर के रंगमंच के लिए भी प्रेरणा है। **मुक्तेश्वर ओझा की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि मंच से शुरू हुआ सफर बड़े पर्दे तक पहुंच सकता है—जरूरत है तो सिर्फ प्रतिभा, धैर्य और लगातार मेहनत की।**