आंगनबाड़ी: बच्चों की पहली पाठशाला या सरकारी आदेशों का बोझ ढोती महिलाएं?

जिनके भरोसे बच्चों का भविष्य, वही महिलाएं अपने वर्तमान के लिए क्यों जूझ रही हैं?

सुबह घर से निकलती एक आंगनबाड़ी कार्यकत्री के हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं होती। उसके पास एक मोबाइल होता है, कुछ रजिस्टर होते हैं, सरकारी आदेशों की लंबी सूची होती है और उम्मीद होती है कि आज वह बच्चों के लिए कुछ अच्छा कर पाएगी।

लेकिन केंद्र पहुंचते-पहुंचते उसे याद आता है—आज बच्चों को पढ़ाना ही नहीं है, रिकॉर्ड भी पूरा करना है। सर्वे का काम भी है। मोबाइल पर रिपोर्ट भी भेजनी है। किसी सरकारी अभियान की जानकारी भी देनी है। ऊपर से कोई नया आदेश आ गया तो वह अलग।

सवाल यह है कि आखिर आंगनबाड़ी कार्यकत्री बच्चों को पढ़ाए या सरकारी आदेशों की फाइलें ढोए?

यह सवाल अब केवल आंगनबाड़ी कार्यकत्री का नहीं है। यह उस व्यवस्था से सवाल है, जो एक ही महिला के कंधों पर लगातार नई जिम्मेदारियां डालती जा रही है।

आंगनबाड़ी केंद्र या सरकारी कामों का 'मल्टीपर्पज सेंटर'?

आंगनबाड़ी केंद्रों का मूल उद्देश्य बच्चों के पोषण, देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा से जुड़ा है। गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना भी उनकी जिम्मेदारी है।

लेकिन जमीन पर कहानी कुछ और दिखाई देती है।

कभी बीएलओ से संबंधित काम, कभी सर्वे, कभी मतदाता संबंधी जिम्मेदारी, कभी किसी अभियान में ड्यूटी और कभी किसी अन्य विभाग के कार्यक्रम में सहभागिता।

हर बार आदेश ऊपर से आता है।

और हर आदेश का बोझ नीचे खड़ी उसी महिला के कंधे पर आ जाता है।

फिर जब आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों की उपस्थिति, शिक्षा या पोषण की स्थिति पर सवाल पूछा जाता है तो सवाल कार्यकत्री से होता है।

लेकिन कोई यह क्यों नहीं पूछता कि उसे बच्चों के लिए समय कितना मिला?

कागज बढ़ते गए, बच्चे पीछे छूटते गए

सरकारी योजनाओं में निगरानी और रिकॉर्ड जरूरी हैं। लेकिन जब रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया इतनी बढ़ जाए कि मूल काम के लिए समय ही न बचे, तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

रजिस्टर, फॉर्म, सर्वे, आंकड़े, मोबाइल एप और ऑनलाइन रिपोर्टिंग—काम की सूची लगातार बढ़ती जा रही है।

आंगनबाड़ी कार्यकत्री को एक साथ कर्मचारी, सर्वेयर, रिपोर्टर, डाटा एंट्री ऑपरेटर और सरकारी योजनाओं की प्रचारक की भूमिका निभानी पड़ती है।

लेकिन क्या उसे इन सभी भूमिकाओं के लिए अलग संसाधन, प्रशिक्षण और पारिश्रमिक मिलता है?

यही वह सवाल है जिसका जवाब व्यवस्था को देना चाहिए।

सरकार ने मोबाइल दिया, लेकिन क्या काम करने लायक व्यवस्था भी दी?

डिजिटल इंडिया के दौर में आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को मोबाइल दिए गए। उद्देश्य था कि काम ऑनलाइन और आसान हो।

लेकिन कई जगह तकनीकी दिक्कतें ही नई परेशानी बन जाती हैं।

मोबाइल की क्षमता, नेटवर्क, एप की समस्या या तकनीकी जानकारी की कमी होने पर कार्यकत्री को दूसरे लोगों की मदद लेनी पड़ती है।

विडंबना देखिए—

जिस व्यवस्था को काम आसान करने के लिए बनाया गया था, वही कभी-कभी कार्यकत्री के लिए एक और काम बन जाती है।

अगर डिजिटल व्यवस्था जरूरी है तो फिर उपकरण भी बेहतर हों, एप सरल हों और तकनीकी सहायता की व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए।

सरकारी कार्यक्रम का खर्च भी अपनी जेब से?

गोदभराई कार्यक्रम हो, पोषण संबंधी आयोजन हो या कोई जागरूकता कार्यक्रम—कागज पर कार्यक्रम सुंदर दिखाई देता है।

लेकिन जमीन पर सवाल अलग है।

व्यवस्था के पास पैसा और सामग्री समय पर नहीं पहुंची तो कार्यक्रम कैसे होगा?

कई कार्यकत्रियों की शिकायत है कि कार्यक्रम को पूरा करने के लिए उन्हें अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है।

कुछ सौ रुपये का खर्च उस महिला के लिए कितना बड़ा है, जिसने पहले ही सीमित मानदेय में अपना घर चलाना है?

क्या सरकार के कार्यक्रम का खर्च भी उस महिला को उठाना चाहिए, जिसके पास पहले से ही पर्याप्त आर्थिक सुरक्षा नहीं है?

किराया महीनों अटका तो केंद्र कैसे चलेगा?

आंगनबाड़ी केंद्र का भवन उपलब्ध न होने पर किराये के स्थान पर केंद्र चलाने की व्यवस्था कई जगह करनी पड़ती है।

लेकिन यदि किराया समय पर नहीं मिले तो सवाल उठता है—आखिर केंद्र चलाने वाली महिला करे क्या?

क्या वह बच्चों को केंद्र से वापस भेज दे?

क्या वह मकान मालिक से रोज जवाब दे?

या फिर अपनी जेब से किराया देती रहे?

व्यवस्था का खर्च कार्यकत्री की निजी जेब से क्यों पूरा हो?

यह केवल भुगतान में देरी नहीं है। यह उस व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल है।

सबसे बड़ा सवाल: बच्चों को पढ़ाए कौन?

आंगनबाड़ी केंद्र को बच्चों की शुरुआती शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने की बातें होती हैं।

लेकिन जिस महिला पर इतनी सारी अतिरिक्त जिम्मेदारियां डाल दी जाएं, उसके पास बच्चों के साथ बैठने, उन्हें समझने, खेल-खेल में सिखाने और उनकी गतिविधियों पर ध्यान देने का समय कितना बचेगा?

बच्चे केवल रजिस्टर में दर्ज संख्या नहीं हैं।

हर बच्चे की अपनी जरूरत है।

किसी को बोलना सीखना है, किसी को अक्षर पहचानना है, किसी को सामाजिक व्यवहार सीखना है और किसी को सिर्फ प्यार और ध्यान चाहिए।

बच्चे को यह सब मोबाइल की स्क्रीन नहीं दे सकती। इसके लिए इंसान चाहिए—और वह इंसान आंगनबाड़ी कार्यकत्री है।

लेकिन अगर उसी कार्यकत्री की आंखें दिनभर रिपोर्टिंग में मोबाइल की स्क्रीन पर और हाथ रजिस्टर भरने में व्यस्त रहेंगे तो बच्चों के लिए समय कौन देगा?

सम्मान सिर्फ मंच पर नहीं, व्यवस्था में भी चाहिए

अक्सर महिला सशक्तीकरण की बातें मंचों से होती हैं।

महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की योजनाएं बनती हैं।

लेकिन उन महिलाओं के बारे में क्या, जो खुद सरकारी योजनाओं को घर-घर पहुंचाने में लगी हैं?

आंगनबाड़ी कार्यकत्री को सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियां, पर्याप्त संसाधन और उचित आर्थिक सुरक्षा देना केवल कर्मचारी हित का विषय नहीं है।

यह बच्चों के भविष्य में निवेश है।

यदि सरकार वास्तव में कुपोषण कम करना चाहती है, बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा मजबूत करना चाहती है और मातृ-शिशु सेवाओं को बेहतर बनाना चाहती है तो उसे सबसे पहले आंगनबाड़ी व्यवस्था की जमीनी हकीकत देखनी होगी।

अब समय है कुछ असहज सवाल पूछने का

क्या आंगनबाड़ी कार्यकत्री की हर नई सरकारी जिम्मेदारी के साथ उसके संसाधन भी बढ़ाए जाते हैं?

क्या अतिरिक्त कार्य का वास्तविक मूल्यांकन होता है?

क्या केंद्रों का किराया समय से मिलता है?

क्या कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त धन और सामग्री समय पर पहुंचती है?

क्या दिए गए मोबाइल वास्तव में काम करने की स्थिति में हैं?

क्या कागजी और डिजिटल काम को कम किया जा सकता है?

और सबसे बड़ा सवाल—

क्या आंगनबाड़ी कार्यकत्री को इतना समय और ऊर्जा मिलती है कि वह उस बच्चे के पास बैठ सके, जिसके भविष्य की जिम्मेदारी सरकार ने उसके हाथों में दी है?

सरकार को आदेश नहीं, समाधान देना होगा

आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों से काम लेना आसान है। एक आदेश जारी कीजिए और नई जिम्मेदारी उनके पास पहुंच जाएगी।

लेकिन शासन केवल आदेशों से नहीं चलता।

व्यवस्था संसाधनों से चलती है, सम्मान से चलती है और जवाबदेही से चलती है।

आंगनबाड़ी कार्यकत्री से यदि बीएलओ का काम लिया जा रहा है तो पूछा जाना चाहिए कि उसके मूल दायित्व का क्या होगा।

यदि सर्वे कराया जा रहा है तो उसका समय और संसाधन कौन देगा?

यदि मोबाइल से काम कराया जा रहा है तो तकनीकी सुविधा कौन सुनिश्चित करेगा?

यदि सरकारी कार्यक्रम कराया जा रहा है तो खर्च कौन देगा?

और यदि केंद्र का किराया नहीं मिला तो उसका बोझ किसके सिर डाला जाएगा?

इन सवालों के जवाब सिर्फ आंगनबाड़ी कार्यकत्री नहीं मांग रही।

इन सवालों का जवाब उन लाखों बच्चों के भविष्य के लिए भी जरूरी है, जिनकी पहली पाठशाला आंगनबाड़ी केंद्र है।

अंतिम सवाल

आंगनबाड़ी कार्यकत्री से हम सब कुछ चाहते हैं—समय, मेहनत, सर्वे, रिपोर्ट, पोषण, शिक्षा, जागरूकता और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन।

तो फिर बदले में उसे क्या मिलता है?

काम का बढ़ता बोझ, कागजों का पहाड़, तकनीकी परेशानियां, अपनी जेब से खर्च और सम्मानजनक आर्थिक सुरक्षा का इंतजार।

यह कैसी व्यवस्था है?

जिस महिला से देश के भविष्य की नींव मजबूत करने की उम्मीद है, उसकी अपनी नींव कब मजबूत होगी?

अब सरकार को इस सवाल से बचना नहीं चाहिए।

क्योंकि आंगनबाड़ी कार्यकत्री कमजोर होगी तो आंगनबाड़ी केंद्र कमजोर होगा और आंगनबाड़ी केंद्र कमजोर होगा तो बच्चों के भविष्य की पहली सीढ़ी ही कमजोर हो जाएगी।