*रवीन्द्र त्रिपाठी*
जनता पैदल चले, नेता काफ़िले में नया भारत का नया तप देश एक बार फिर त्याग के महायज्ञ में प्रवेश कर चुका है। जनता से कहा गया है कि सोना-चांदी मत खरीदो, निजी गाड़ियों में मत चलो, घर का काम खुद करो। सुनते ही देश की करोड़ों जनता भाव-विभोर हो उठी। लगा जैसे अचानक से पूरा राष्ट्र हिमालय की किसी गुफा में तपस्या करने निकल पड़ा हो।
अब अगर कोई मध्यमवर्गीय परिवार शादी में बेटी को दो चूड़ी दिलाने की सोच रहा था, तो उसे समझ लेना चाहिए कि वह राष्ट्रहित के खिलाफ़ षड्यंत्र कर रहा था। आखिर देश तभी मजबूत होगा जब दुल्हन के हाथों में सोना नहीं, “आत्मनिर्भरता” चमकेगी। अब मंगलसूत्र की जगह शायद सरकार “वोकल फॉर लोकल” का बैज दे दे।
उधर सर्राफा बाजार के दुकानदार भी बड़े देशभक्त निकले। ग्राहक आते हैं तो कहते हैं — “भाई साहब, अब गहने नहीं, सिर्फ़ राष्ट्रभक्ति बिकेगी।”
ग्राहक पूछता है “लेकिन शादी में क्या पहनाएं?”दुकानदार मुस्कुराता है “त्याग पहनाइए, वही नया फैशन है”और निजी गाड़ियों का क्या कहना! जनता से कहा गया कि निजी वाहन कम चलाइए। बिल्कुल सही बात है। आखिर सड़कें आम आदमी की कारों से भर गई थीं। देश की असली समस्या बेरोजगारी, महंगाई या टूटी सड़कें नहीं, बल्कि वह स्कूटर है जिस पर बैठकर कोई पिता अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाता है।
अब देश का आदर्श नागरिक वही माना जाएगा जो सुबह 12 किलोमीटर पैदल चलकर दफ्तर पहुंचे और शाम को लौटते वक्त राष्ट्रगान गुनगुनाए। पेट्रोल बचाने का ऐसा आध्यात्मिक मॉडल शायद दुनिया ने पहली बार देखा होगा।
हालांकि जनता को यह सलाह टीवी पर सुनाई जाती है, और टीवी पर दिखता है कि नेता जी का काफ़िला 25 गाड़ियों के साथ निकल रहा है। आगे पायलट गाड़ी, पीछे सुरक्षा गाड़ी, बीच में वातानुकूलित लोकतंत्र। जनता को साइकिल का उपदेश, और सत्ता को “जेड प्लस माइलेज”।
देश में अब एक नई आर्थिक परिभाषा बन रही है गरीब आदमी मजबूरी में पैदल चले तो गरीबी,
और अगर सरकार कह दे तो वही “राष्ट्र निर्माण”।
घर का काम खुद करने की सलाह भी ऐतिहासिक है। अब देश का मध्यवर्ग सुबह झाड़ू लगाएगा, बर्तन मांजेगा, फिर ऑनलाइन मीटिंग में कैमरा ऑफ करके रोटी बेलते हुए बोलेगा “यस सर, इंडिया इज़ ग्रोइंग।”
पति अब पत्नी से कहेगा “देखो, मैं सिर्फ़ पति नहीं, राष्ट्रसेवक भी हूं। आज मैंने खुद चाय बनाई है।”
पत्नी जवाब देगी “तो क्या भारत रत्न दूं?”
सबसे खूबसूरत बात यही है कि त्याग हमेशा जनता से मांगा जाता है। सत्ता कभी त्याग की प्रतीकात्मक फोटो खिंचवा सकती है, मगर असली त्याग हमेशा वही आदमी करता है जिसकी जेब पहले से खाली हो।
देश में यह नया सिद्धांत चल पड़ा है
जनता कम खाए, कम खरीदे, कम चले, कम मांगे…ताकि विकास के आंकड़े ज्यादा दौड़ सकें।
कभी गैस छोड़ो, कभी कार छोड़ो, कभी गहने छोड़ो, कभी सुविधा छोड़ो। ऐसा लगने लगा है कि आने वाले दिनों में सरकार यह भी कह सकती है कि“देशहित में सांस थोड़ी कम लीजिए, ऑक्सीजन बचेगी।”
लेकिन भारतीय जनता भी अद्भुत है। वह हर सलाह को आदेश मानकर सह लेती है। टैक्स भी देगी, महंगाई भी झेलेगी, और फिर टीवी पर सुनकर ताली भी बजाएगी कि “त्याग ही राष्ट्रधर्म है।”शायद लोकतंत्र का सबसे बड़ा चमत्कार यही है जहां सुविधाएं ऊपर जाती हैं और त्याग नीचे उतरता है।
