नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं है। यह उस बदलती विश्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसमें अमेरिका और यूरोप के पारंपरिक प्रभाव के साथ-साथ एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका की उभरती शक्तियां अपनी भूमिका मजबूत कर रही हैं। भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और उसके सामने दुनिया के सबसे प्रभावशाली उभरते देशों को एक साझा मंच पर लाने के साथ-साथ अपने राष्ट्रीय हितों को साधने की बड़ी चुनौती है।
ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन से हुई थी और बाद में दक्षिण अफ्रीका तथा नए सदस्य देशों के जुड़ने से इसका दायरा काफी बढ़ गया। वर्तमान में इसमें 11 सदस्य देश हैं और यह समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी तथा करीब 40 प्रतिशत वैश्विक GDP का प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण है कि अब ब्रिक्स को केवल आर्थिक सहयोग का मंच मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह धीरे-धीरे वैश्विक राजनीति, व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और वित्तीय व्यवस्था को प्रभावित करने वाला मंच बन चुका है।
भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर—वैश्विक नेतृत्व
भारत के लिए ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह हो सकती है कि वह स्वयं को केवल दक्षिण एशिया की शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि Global South की एक प्रमुख आवाज के रूप में स्थापित करे।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की मांग करता रहा है। आज दुनिया की आर्थिक और जनसंख्या संबंधी वास्तविकता बदल चुकी है, लेकिन वैश्विक संस्थाओं की निर्णय प्रक्रिया अभी भी पुराने शक्ति-संतुलन को काफी हद तक प्रतिबिंबित करती है। ब्रिक्स के माध्यम से भारत इस असंतुलन को बदलने की आवाज को मजबूत कर सकता है।
भारत की अध्यक्षता का जोर भी केवल राजनीतिक घोषणाओं पर नहीं बल्कि आर्थिक, तकनीकी, वित्तीय और सतत विकास संबंधी व्यावहारिक सहयोग पर है। भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए हैं।
व्यापार और निवेश में बड़ा फायदा
यदि ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक बाधाएं कम होती हैं, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है और भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल बनता है, तो भारत को इसका सीधा आर्थिक लाभ मिल सकता है।
भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था, विशेषकर UPI, दुनिया के सामने एक सफल मॉडल बन चुकी है। यदि ब्रिक्स देशों के बीच डिजिटल भुगतान और वित्तीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा मिलता है तो भारतीय तकनीकी कंपनियों, बैंकिंग क्षेत्र और स्टार्टअप के लिए नए बाजार खुल सकते हैं।
इसी तरह ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि, खाद्य सुरक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, AI और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत की अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकता है।
भारत की प्राथमिकताओं में मजबूत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा सुरक्षा, नवाचार और सतत विकास जैसे विषय शामिल हैं।
रोजगार और उद्योग के लिए संभावनाएं
ब्रिक्स सम्मेलन का लाभ केवल सरकारों और बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। असली सफलता तब होगी जब इसका फायदा छोटे उद्योगों, MSME, स्टार्टअप, किसानों, युवाओं और कुशल कामगारों तक पहुंचे।
यदि भारतीय कंपनियों को ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र और अन्य ब्रिक्स बाजारों में आसान पहुंच मिलती है तो निर्यात बढ़ सकता है। इससे उत्पादन, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल सेवाओं और रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो सकती है।
भारत ने अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता में युवाओं, तकनीक और उद्यमिता को भी महत्व दिया है। इसलिए आने वाले वर्षों में ब्रिक्स युवा उद्यमियों और स्टार्टअप के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है—इसके सदस्य देशों के हित एक जैसे नहीं हैं।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक अविश्वास की पृष्ठभूमि रही है। रूस और पश्चिम के बीच तनाव ने वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच संबंध अलग प्रकार की चुनौती पैदा करते हैं। ऐसे में सभी सदस्य देशों को किसी एक राजनीतिक मुद्दे पर एकमत कराना आसान नहीं होगा।
भारत के लिए चुनौती यह भी है कि वह रूस और चीन जैसे देशों के साथ ब्रिक्स में सहयोग करते हुए अमेरिका, यूरोप, जापान और अन्य साझेदारों के साथ अपने संबंधों को भी संतुलित रखे।
इसलिए भारत के सामने असली परीक्षा यह होगी कि वह ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन के रूप में विकसित होने से रोकते हुए इसे विकास, व्यापार और बहुपक्षीय सहयोग का प्रभावी मंच बनाए।
क्या ब्रिक्स डॉलर का विकल्प बन सकता है?
यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। ब्रिक्स देशों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने तथा वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर विचार हो रहा है। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है।
लेकिन निकट भविष्य में डॉलर को पूरी तरह हटाना व्यावहारिक नहीं दिखाई देता। इसके लिए सदस्य देशों के बीच अत्यधिक वित्तीय विश्वास, स्थिर विनिमय व्यवस्था, गहरे पूंजी बाजार और मजबूत साझा संस्थागत ढांचे की आवश्यकता होगी।
इसलिए ब्रिक्स का वास्तविक लक्ष्य डॉलर को अचानक समाप्त करना नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विकल्पों की संख्या बढ़ाना होना अधिक व्यावहारिक है।
भारत को चीन के साथ संबंधों का भी रास्ता निकालना होगा
ब्रिक्स की सफलता काफी हद तक भारत-चीन संबंधों पर निर्भर कर सकती है। दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा है, लेकिन आर्थिक सहयोग की संभावनाएं भी बहुत बड़ी हैं।
यदि दोनों देश सीमा विवादों को नियंत्रित रखते हुए व्यापार और आर्थिक संबंधों में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो ब्रिक्स भारत के लिए संवाद का एक अतिरिक्त मंच बन सकता है।
लेकिन भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आर्थिक सहयोग राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील क्षेत्रों से समझौता किए बिना हो।
नुकसान और जोखिम क्या हैं?
ब्रिक्स से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पहला जोखिम है—राजनीतिक मतभेद। यदि सदस्य देश हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अलग-अलग खड़े होते हैं तो संगठन की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
दूसरा जोखिम है—विस्तार। ज्यादा देशों के जुड़ने से ब्रिक्स का प्रभाव बढ़ता है, लेकिन निर्णय लेना कठिन भी हो सकता है। जितने अधिक देश, उतने अधिक हित और उतने ही अधिक मतभेद।
तीसरा जोखिम है—घोषणाओं और वास्तविक परिणामों के बीच अंतर। यदि हर सम्मेलन के बाद बड़ी घोषणाएं हों लेकिन व्यापार, निवेश, भुगतान, तकनीक और विकास के क्षेत्र में वास्तविक बदलाव न आए तो धीरे-धीरे ब्रिक्स की विश्वसनीयता कम हो सकती है।
चौथा जोखिम भारत के लिए रणनीतिक है। यदि ब्रिक्स को खुलकर पश्चिम-विरोधी मंच का रूप मिलता है तो भारत की संतुलित विदेश नीति पर दबाव बढ़ सकता है।
भविष्य में ब्रिक्स कहां जाएगा?
ब्रिक्स का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह राजनीतिक भाषणों से आगे बढ़कर कितने ठोस संस्थागत ढांचे खड़े करता है।
यदि सदस्य देश साझा भुगतान व्यवस्था, व्यापार सुविधा, निवेश कोष, ऊर्जा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, स्वास्थ्य सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में स्थायी संस्थाएं बनाते हैं तो अगले दशक में ब्रिक्स वैश्विक व्यवस्था के प्रमुख स्तंभों में शामिल हो सकता है।
यदि इसके विपरीत संगठन केवल पश्चिमी व्यवस्था की आलोचना तक सीमित रहता है और सदस्य देशों के आपसी मतभेद बढ़ते जाते हैं, तो इसका प्रभाव सीमित रह जाएगा।
भारत के लिए सबसे अच्छा रास्ता यही है कि वह ब्रिक्स को टकराव का मंच नहीं, विकल्प और सहयोग का मंच बनाए।
निष्कर्ष : भारत के सामने ऐतिहासिक अवसर
2026 का ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए केवल विदेशी मेहमानों की मेजबानी या कूटनीतिक प्रतिष्ठा का अवसर नहीं है। यह भारत की विदेश नीति, आर्थिक शक्ति और वैश्विक नेतृत्व की परीक्षा है।
भारत यदि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच विश्वास पैदा करने में सफल होता है, व्यापार और निवेश के ठोस समझौते करवाता है, डिजिटल तकनीक और ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाता है तथा चीन-रूस सहित विभिन्न शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है, तो ब्रिक्स भारत की वैश्विक भूमिका को नई ऊंचाई दे सकता है।
लेकिन भारत को यह भी याद रखना होगा कि सिर्फ बड़ा सम्मेलन बड़ी उपलब्धि नहीं होता। असली उपलब्धि वह होगी जिसका असर भारतीय उद्योग, किसान, युवा, रोजगार, तकनीक और आम नागरिक के जीवन पर दिखाई दे।
ब्रिक्स का भविष्य शायद किसी एक देश के नेतृत्व से तय नहीं होगा, लेकिन भारत की 2026 की अध्यक्षता यह जरूर तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि यह संगठन केवल एक प्रभावशाली समूह बनकर रहता है या आने वाली बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का एक मजबूत संस्थागत स्तंभ बनता है।
भारत के लिए ब्रिक्स का मंत्र स्पष्ट होना चाहिए—विश्व राजनीति में प्रभाव बढ़े, लेकिन राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहें;l