सम्पादक की कलम से
चौराहे पर अचानक ढोल की आवाज गूंजती है। कुछ कलाकार गोल घेरा बनाते हैं। कोई किसान बनता है, कोई मजदूर, कोई अधिकारी, कोई भ्रष्ट व्यवस्था का चेहरा। देखते ही देखते राह चलते लोग रुक जाते हैं और शुरू हो जाता है—नुक्कड़ नाटक।
न कोई बड़ा मंच, न महंगी लाइटें, न वातानुकूलित सभागार। सड़क ही मंच है और आम आदमी ही दर्शक।
नुक्कड़ नाटक का आधुनिक भारतीय स्वरूप बीसवीं सदी के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के साथ मजबूत हुआ। भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा (IPTA) के गठन 1943 के दौर में कला को जनता की समस्याओं, संघर्षों और सामाजिक चेतना से जोड़ने का बड़ा प्रयास हुआ। बाद में 1970 के दशक में जन आंदोलनों के साथ नुक्कड़ नाटक एक प्रभावशाली जनमाध्यम के रूप में और मजबूत हुआ।
नुक्कड़ नाटक की सबसे बड़ी ताकत यही रही कि उसे देखने के लिए जनता को टिकट खरीदकर थिएटर नहीं जाना पड़ा। नाटक खुद जनता के बीच चला गया।
आज यही माध्यम सरकारी योजनाओं की जानकारी देने, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य, बालिका सुरक्षा, मतदान, नशामुक्ति, पर्यावरण और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता फैलाने में इस्तेमाल होता है।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है—
जो कलाकार सरकार का संदेश घर-घर पहुंचा रहे हैं, सरकार का संदेश उन तक कब पहुंचेगा?
सरकारी योजना का प्रचार करने वाला कलाकार कई बार खुद ऐसी जिंदगी जीता है, जिसमें महीने की आमदनी निश्चित नहीं होती। आज कार्यक्रम मिला तो कुछ पैसे आ गए, कल कार्यक्रम नहीं मिला तो घर का चूल्हा कैसे जलेगा—इसका कोई भरोसा नहीं।
वह दूसरों को शिक्षा का महत्व बताता है, लेकिन अपने बच्चों की फीस के लिए परेशान होता है।
वह लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करता है, लेकिन खुद बीमार पड़ जाए तो इलाज के पैसे जुटाना मुश्किल हो जाता है।
वह श्रमिकों के अधिकारों पर संवाद बोलता है, लेकिन स्वयं कलाकार होने के कारण उसके श्रम का उचित मूल्य तय नहीं होता।
यह कैसी विडंबना है?
जो कलाकार समाज को आवाज देता है, उसकी अपनी आवाज अक्सर व्यवस्था के गलियारों तक पहुंच ही नहीं पाती।
नुक्कड़ नाटक के कलाकारों को केवल “कार्यक्रम करने वाला समूह” समझना बंद करना होगा। वे लोक-संचार के योद्धा हैं। वे उस जगह पहुंचते हैं जहां पोस्टर नहीं पहुंचता, विज्ञापन नहीं पहुंचता और कभी-कभी सरकारी अधिकारी भी नहीं पहुंच पाते।
एक कलाकार कुछ मिनटों में वह बात लोगों को समझा देता है, जिसके लिए लाखों रुपये के प्रचार अभियान चलाए जाते हैं।
तो फिर इन कलाकारों के लिए कोई ठोस नीति क्यों नहीं?
क्यों न सरकार जिला स्तर पर पंजीकृत नुक्कड़ नाटक कलाकारों का कलाकार पहचान-पत्र बनाए?
क्यों न उन्हें सरकारी जनजागरूकता अभियानों में निर्धारित और सम्मानजनक पारिश्रमिक मिले?
क्यों न वरिष्ठ और जरूरतमंद रंगकर्मियों के लिए कलाकार सहायता योजना बनाई जाए?
क्यों न उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा और आकस्मिक सहायता के लिए विशेष प्रावधान हो?
और सबसे जरूरी—क्यों न यह तय किया जाए कि सरकारी योजनाओं के प्रचार में कलाकारों से काम लेने के बाद भुगतान के लिए उन्हें महीनों दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें?
सरकार अगर करोड़ों रुपये विज्ञापन पर खर्च कर सकती है तो उस संदेश को जमीन तक पहुंचाने वाले कलाकार को सम्मानजनक पारिश्रमिक देने में कंजूसी क्यों?
कलाकार भी मजदूर है—बस उसका औजार उसके हाथ नहीं, उसकी आवाज है।
हम अक्सर बड़े कलाकारों, बड़े मंचों और चमकदार प्रस्तुतियों की चर्चा करते हैं। लेकिन शहर के किसी छोटे से मोहल्ले में, किसी गांव के चौराहे पर, धूल में खड़ा वह कलाकार भी कला की उतनी ही बड़ी सेवा कर रहा होता है।
उसके पास शायद स्टारडम नहीं है, लेकिन उसके पास समाज को आईना दिखाने का साहस है।
इसलिए अब वक्त आ गया है कि नुक्कड़ नाटक को केवल मनोरंजन या प्रचार का माध्यम न माना जाए। इसे जन-जागरूकता की महत्वपूर्ण सामाजिक सेवा के रूप में मान्यता दी जाए और इसके कलाकारों के लिए ठोस सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि—
“नुक्कड़ नाटक समाज को क्या संदेश दे रहा है?”
सवाल यह भी है—
“समाज और सरकार उस कलाकार को क्या संदेश दे रहे हैं, जो वर्षों से समाज को जागने का संदेश देता आ रहा है?”
अगर जवाब है—“कुछ नहीं”,
तो फिर हमें सचमुच एक और नुक्कड़ नाटक की जरूरत है।
लेकिन इस बार मंच पर कलाकार नहीं, व्यवस्था खड़ी होनी चाहिए।
और दर्शक हों—हम सब।
— सम्पादक की कलम से सूर्य नारायण पाण्डेय (एडिटर )
“नुक्कड़ नाटक: संदेश देने वालों की अनसुनी कहानी”


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