312 तालाबों के अस्तित्व पर सवाल, KDA की भूमिका पर महापौर ने मांगी जांच; मंडलायुक्त से कमेटी गठित कर कार्रवाई की मांग
कानपुर।
बारिश होते ही जलभराव से जूझते कानपुर को लेकर अब महापौर प्रमिला पांडेय ने सीधे तौर पर शहर के गायब होते तालाबों का मुद्दा उठाते हुए जिम्मेदार विभागों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गुरुवार को प्रेस कांफ्रेंस में महापौर ने कहा कि शहर में जलभराव और गिरते भूजल स्तर की बड़ी वजह पारंपरिक तालाबों का खत्म होना है। सरकारी अभिलेखों के मुताबिक KDA की पुरानी सीमा में 86 गांवों में 312 तालाब दर्ज हैं, लेकिन महापौर के अनुसार बड़ी संख्या में तालाब या तो अतिक्रमण की चपेट में हैं अथवा अस्तित्व खो चुके हैं।
महापौर ने दावा किया कि उन्होंने कुछ दिन पहले KDA से शहर के तालाबों की सूची मांगी थी और सूची सामने आने के बाद कई सवाल खड़े हुए हैं। उनका आरोप है कि तालाबों की जमीन को विकास के नाम पर बेचा गया या वहां अतिक्रमण होने दिया गया। अगर तालाब ही नहीं बचेंगे तो बरसात का पानी जाएगा कहां? यही सवाल अब शहर के सामने खड़ा है।
महापौर ने कहा कि पहले बारिश का अतिरिक्त पानी तालाबों में समा जाता था, लेकिन तालाबों की जगह कॉलोनियां और बाजार विकसित होने से पानी के प्राकृतिक ठहराव की व्यवस्था खत्म होती गई। इसका सीधा असर जलभराव के रूप में सामने आ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि शहर में नाला सफाई पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, जबकि तालाबों को बचाकर बरसाती पानी को प्राकृतिक रूप से रोकने की व्यवस्था मजबूत की जा सकती है।
महापौर ने मांगी जांच, तय हो जिम्मेदारी
महापौर ने मंडलायुक्त से मांग की कि तालाबों की स्थिति की जांच के लिए तत्काल कमेटी गठित की जाए। प्रत्येक तालाब की राजस्व अभिलेखों के आधार पर सीमा तय हो, मौके पर जांच कराई जाए और जहां सरकारी या तालाबी जमीन पर कब्जा अथवा निर्माण मिला है, वहां जिम्मेदारी तय की जाए।
उन्होंने तालाबों का ड्रोन और GIS सर्वे कराने की भी मांग उठाई है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अभिलेखों में दर्ज तालाब आज जमीन पर कहां हैं और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है।
जनता से महापौर की अपील—तालाब पर कब्जा दिखे तो बताएं
महापौर ने शहरवासियों से भी आह्वान किया कि यदि कहीं तालाब की जमीन पर कब्जा हुआ है या कब्जे की कोशिश चल रही है तो तत्काल इसकी जानकारी दी जाए। उनका कहना है कि जनता और नगर निगम मिलकर तालाबों को कब्जामुक्त कराने की मुहिम चला सकते हैं।
अब सवाल सिर्फ एक बारिश में सड़क पर भरने वाले पानी का नहीं है। सवाल यह है कि शहर के प्राकृतिक जलाशय आखिर कहां चले गए? यदि तालाबों की जमीन पर निर्माण और अतिक्रमण की शिकायतें सही पाई जाती हैं तो इसकी जिम्मेदारी किसकी थी और इतने वर्षों तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई—इसकी निष्पक्ष जांच ही पूरे मामले की तस्वीर साफ कर सकती है।