अधिकारी, नगर निगम, पीडब्ल्यूडी, केडीए और जल निगम के बीच समन्वय की कमी का खामियाजा भुगत रहा शहर
कानपुर।
घर हो या कार्यस्थल, जहां आपसी तालमेल कमजोर पड़ता है, वहां व्यवस्था धीरे-धीरे बिखरने लगती है। जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने का सिलसिला शुरू हो जाए तो समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या और बड़ी होती जाती है। कुछ ऐसा ही सवाल आज कानपुर की सड़कों, जलभराव और नागरिक सुविधाओं को लेकर खड़ा हो रहा है।
शहर में कहीं सड़क टूटी है, कहीं गहरे गड्ढे हैं तो कहीं बारिश के बाद सड़क की स्थिति और खराब हो गई है। इन गड्ढों से रोजाना दोपहिया वाहन चालक और राहगीर जूझ रहे हैं। दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है और नागरिकों का आक्रोश भी सामने आ रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन सड़कों की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
किसी सड़क को लेकर यदि एक विभाग कहता है कि यह उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती, दूसरा विभाग किसी और एजेंसी की ओर इशारा करता है और तीसरा विभाग अपनी अलग जिम्मेदारी बताता है, तो आम नागरिक जाए तो जाए कहां?
यही वह स्थिति है जहां 'जिम्मेदारी की गेंद एक-दूसरे के पाले में डालने' की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं। कागजों में विभाग अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन सड़क पर गिरने वाला नागरिक यह नहीं देखता कि सड़क नगर निगम की है, पीडब्ल्यूडी की, केडीए की या किसी अन्य एजेंसी की।
मेयर ने पत्रकारों से मांगे सुझाव
आज महापौर ने पत्रकारों के साथ संवाद करते हुए शहर की समस्याओं और उनके समाधान को लेकर सुझाव मांगे। पत्रकारों ने भी अपने-अपने अनुभव और सुझाव सामने रखे।
किसी ने सड़क किनारे गलत स्थानों पर लगे साइन बोर्ड और विज्ञापन बोर्डों का मुद्दा उठाया तो किसी ने ट्रैफिक इंजीनियरिंग और यातायात व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता बताई। यह संवाद इस बात की ओर संकेत करता है कि शहर की समस्याएं केवल एक विभाग के स्तर पर हल होने वाली नहीं हैं।
महापौर की ओर से बारिश का दौर समाप्त होने के बाद सड़कों सहित विभिन्न विकास कार्यों को गति देने की बात कही गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल काम शुरू कर देना पर्याप्त होगा, या इस बार विभागों के बीच स्थायी समन्वय की व्यवस्था भी बनाई जाएगी?
312 तालाबों का शहर और घटते जलस्रोत
कानपुर की जलभराव समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू शहर के तालाब और प्राकृतिक जलनिकासी तंत्र से भी जुड़ा है। शहर में कभी बड़ी संख्या में तालाब और जलस्रोत थे। समय के साथ इनका स्वरूप बदलने, अतिक्रमण और अन्य कारणों से जलनिकासी की प्राकृतिक व्यवस्था प्रभावित होने की चर्चा लगातार होती रही है।
बारिश के दौरान जब पानी तेजी से सड़कों और निचले इलाकों में जमा होता है, तब केवल नालों की सफाई को समाधान मान लेना पर्याप्त नहीं है। शहर को अपनी प्राकृतिक जलनिकासी व्यवस्था को भी समझना और बचाना होगा।
नगर निगम अकेला नहीं कर सकता शहर का उद्धार
कानपुर जैसे बड़े शहर की समस्याओं का समाधान केवल नगर निगम के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सड़क निर्माण और मरम्मत, सीवर एवं जलनिकासी, यातायात प्रबंधन, विकास प्राधिकरण की योजनाएं और अतिक्रमण—इन सबका सीधा संबंध एक-दूसरे से है।
यही वजह है कि नगर निगम, पीडब्ल्यूडी, केडीए, जल निगम, यातायात पुलिस और जिला प्रशासन के बीच जमीन पर दिखाई देने वाला समन्वय जरूरी है।
बैठकें होती हैं, अधिकारी बैठते हैं, योजनाएं बनती हैं—लेकिन आम नागरिक को परिणाम सड़क पर चाहिए। यदि बैठक के बाद भी एक विभाग दूसरे विभाग की ओर जिम्मेदारी भेजता रहे तो ऐसी बैठकों का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है।
लखनऊ से हो सकती है बड़ी पहल
अब आवश्यकता इस बात की है कि शासन स्तर पर कानपुर की समस्याओं को विभागीय सीमाओं से बाहर निकालकर देखा जाए। लखनऊ में बैठे वरिष्ठ अधिकारी यदि नगर निगम, पीडब्ल्यूडी, केडीए, जल निगम और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारियों को एक साझा मंच पर बैठाकर जिम्मेदारी की स्पष्ट कार्ययोजना तैयार करें तो स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है।
हर प्रमुख सड़क के लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसका निर्माण, मरम्मत, जलनिकासी और रखरखाव किस विभाग की जिम्मेदारी है। जहां दो या अधिक विभागों की भूमिका है, वहां किसी एक नोडल अधिकारी को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
सवाल सड़क का नहीं, व्यवस्था का है
कानपुर के नागरिकों को यह जानने में दिलचस्पी नहीं कि गड्ढा किस विभाग की फाइल में दर्ज है। उन्हें सुरक्षित सड़क चाहिए।
उन्हें यह नहीं जानना कि जलभराव के लिए कौन सा विभाग जिम्मेदार है। उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें बारिश का पानी समय पर निकल सके।
उन्हें यह भी नहीं चाहिए कि हर शिकायत के बाद जिम्मेदारी किसी दूसरे विभाग के पाले में चली जाए।
अब जरूरत 'किसकी जिम्मेदारी है?' पूछने से आगे बढ़कर 'कौन जिम्मेदारी लेगा?' तय करने की है।
कानपुर को योजनाओं से ज्यादा जिम्मेदार विभागीय समन्वय, स्पष्ट जवाबदेही और जमीन पर काम की जरूरत है। अगर इस दिशा में गंभीर पहल होती है तो शहर की सड़क, जलभराव, यातायात और नागरिक सुविधाओं से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान संभव है।
वरना गड्ढे वही रहेंगे, शिकायतें वही रहेंगी और जिम्मेदारी की गेंद भी हमेशा की तरह एक पाले से दूसरे पाले में जाती रहेगी।
कानपुर को अब गेंद पास करने वाली व्यवस्था नहीं, समाधान करने वाली व्यवस्था चाहिए।

