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समस्त साधनाओं का मूल आधार पवित्र "माँ "-"ॐ " बीज मन्त्र है l

टीम पुलिस प्रहरी
1 महीने पहले
समस्त साधनाओं का मूल आधार पवित्र "माँ "-"ॐ " बीज मन्त्र है l

लेख: "माँ-ॐ बीज मंत्र" – समस्त साधनाओं का मूल आधार
मूलजनक - ब्रह्म ऋषि परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र सदगुरुदेव जी महाराज
संकलन: शक्ति साधक आचार्य कश्यप
हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में बीज मंत्रों का विशेष महत्व है। बीज मंत्र वे सूक्ष्म ध्वनियाँ हैं, जिनमें ब्रह्मांड की अपार शक्ति समाहित होती है। इन समस्त ध्वनियों में "माँ" और "ॐ" को सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली बीज मंत्र माना गया है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि "माँ-ॐ बीज मंत्र के बिना समस्त साधनाएं अधूरी हैं।"
ब्रह्मांड की मूल ध्वनि का संगम
प्रकृति का मूल शब्द "माँ" है, जो आत्मा को उसके अस्तित्व से जोड़ता है। वहीं "ॐ" को 'अनाहत नाद' या ब्रह्मांड की आदि-ध्वनि कहा जाता है। जब हम "माँ-ॐ" का संयुक्त जप करते हैं, तो इसका अर्थ अपनी आत्म-जननी माँ आदिशक्ति और संपूर्ण ब्रह्मांड की संयुक्त शक्ति का आह्वान करना होता है।
यह मंत्र सृष्टि (अकार), स्थिति (उकार) और लय (मकार) के साथ प्रकृति सत्ता के मूल संगम का प्रतीक है। किसी भी साधना के प्रारंभ में इनका उच्चारण साधक के आधार को सुदृढ़ करता है।
गुरुदेव के आलोक में: चेतना का जागरण
परमपूज्य गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र सदगुरुदेव जी महाराज के अनुसार— “माँ-ॐ का उच्चारण आंतरिक चेतना शक्ति को जाग्रत कर उसे संतुलन प्रदान करता है।”
यह केवल मंत्र नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो शरीर, मन, बुद्धि और चेतना को मथने का कार्य करती है। यह वह गुप्त बीज मंत्र है, जो 'अंतरंग योग' का मूल आधार है। हमारी कुंडलिनी शक्ति का पूर्ण जागरण और संतुलन इसी मंत्र के जप पर टिका हुआ है।
साधना में "माँ-ॐ" के प्रमुख लाभ
* विकारों से मुक्ति: निरंतर और शुद्ध उच्चारण से अनंत जन्मों के संचित कर्मों के दूषित विचार और तरंगें नष्ट होती हैं, जिससे चित्त का शोधन होता है।
* सूर्य-चंद्र नाड़ी का संतुलन: आध्यात्मिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए इड़ा (चंद्र) और पिंगला (सूर्य) नाड़ी का संतुलन अनिवार्य है। केवल "माँ-ॐ" बीज मंत्र के प्रभाव से ये नाड़ियाँ स्थाई रूप से संतुलित होती हैं, जिससे साधना सिद्ध होती है।
* आत्मा और परमात्मा का मिलन: "ॐ" जहाँ आत्मा को ब्रह्मांडीय विस्तार से जोड़ता है, वहीं "माँ" शब्द उस शक्ति से जोड़ता है जो इस ब्रह्मांड को गति देती है। अतः यह जप जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग प्रशस्त करता है।
* चक्रों का सक्रियण: इस मंत्र का कंपन शरीर के विभिन्न ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को सक्रिय करता है, जिससे साधक उच्च आध्यात्मिक अवस्थाओं को प्राप्त करने के योग्य बनता है।
बाधा निवारण और साधना की पूर्णता
साधना के मार्ग में आने वाली मानसिक और बाहरी चुनौतियों से लड़ने की शक्ति "माँ-ॐ" से ही प्राप्त होती है। यह मंत्र साधक में वह समर्पण और विश्वास पैदा करता है, जिसके बिना कोई भी तपस्या पूर्ण नहीं मानी जाती। "माँ" शब्द ममता और करुणा का प्रतीक है, जो साधक को यह बोध कराता है कि अंतिम लक्ष्य आदिशक्ति की कृपा प्राप्त कर उन्हीं के स्वरूप में विलीन होना है।
निष्कर्ष
"माँ-ॐ" कोई साधारण ध्वनि नहीं, बल्कि ईश्वरीय कृपा का जीवंत प्रतीक है। यह साधक को वह आधार, दिशा और सुरक्षा कवच प्रदान करता है, जिससे साधना फलदायी बनती है। इसलिए प्रत्येक साधक के लिए अपनी साधना को सफल बनाने हेतु इस महामंत्र का आश्रय लेना परम आवश्यक है।
साभार - पंचज्योति शक्ति तीर्थ सिद्ध आश्रम पोस्ट मऊ जिला शहडोल मध्यप्रदेश (भारत)

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