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गर्भावस्था के दौरान मां के आहार, व्यवहार एवं वातावरण का असर शिशु पर पड़ता है=डॉ वी एन त्रिपाठी

टीम पुलिस प्रहरी
1 महीने पहले
गर्भावस्था के दौरान मां के आहार, व्यवहार एवं वातावरण का असर शिशु पर पड़ता है=डॉ वी एन त्रिपाठी

कानपुर। गर्भावस्था के दौरान माँ के आहार, व्यवहार, विचार और वातावरण का प्रभाव गर्भस्थ शिशु के मानसिक, शारीरिक एवं भावनात्मक विकास पर पड़ता है। भारतीय परंपरा और आयुर्वेद पर आधारित ‘गर्भ संस्कार’ की अवधारणा इसी सिद्धांत पर आधारित है।
वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ प्रो वी एन त्रिपाठी ने बताया कि गर्भावस्था केवल शारीरिक बदलाव का समय नहीं, बल्कि शिशु के व्यक्तित्व निर्माण की प्रारंभिक अवस्था होती है। उन्होंने कहा कि “माँ की मानसिक स्थिति, खानपान और पारिवारिक माहौल का सीधा प्रभाव बच्चे के विकास पर पड़ता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान सकारात्मक और संतुलित जीवनशैली अपनाना बेहद आवश्यक है।”
उन्होंने बताया कि गर्भ संस्कार के अंतर्गत गर्भवती महिला को तनावमुक्त और प्रसन्नचित्त रहने का प्रयास करना चाहिए। सकारात्मक सोच, मधुर संवाद और शांत वातावरण शिशु के मानसिक विकास में सहायक होते हैं। इसके साथ ही शांत संगीत, भजन या मंत्र सुनना भी लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इससे माँ का तनाव कम होता है।
प्रो. त्रिपाठी ने संतुलित आहार पर विशेष जोर देते हुए कहा कि गर्भवती महिला को दूध, फल, हरी सब्जियाँ, दालें और मेवे जैसे पौष्टिक आहार लेने चाहिए। आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन युक्त भोजन शिशु के शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है, जबकि जंक फूड से परहेज करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि हल्का प्रेगनेंसी योग और प्राणायाम चिकित्सकीय सलाह से किया जा सकता है, जिससे माँ का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है। साथ ही परिवार का सहयोग और स्नेह गर्भवती महिला के आत्मविश्वास को बढ़ाता है, जो स्वस्थ गर्भावस्था के लिए जरूरी है।
प्रो. वी एन त्रिपाठी के अनुसार, गर्भ संस्कार को अंधविश्वास के रूप में नहीं बल्कि सकारात्मक जीवनशैली के रूप में अपनाया जाना चाहिए। संतुलित आहार, सकारात्मक सोच और नियमित चिकित्सकीय परामर्श के साथ गर्भ संस्कार की परंपरा माँ और शिशु दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

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