नेपाल की त्रासदी का जिम्मेदार कौन—प्रकृति या हम?
लेखक : सूर्य नारायण पाण्डेय
नेपाल की धरती पर आई त्रासदी को देखकर आंखें नम हैं और मन बेचैन। कहीं घर उजड़े, कहीं सड़कें टूटीं, कहीं पुल बह गए और कहीं परिवारों से उनके अपने हमेशा के लिए दूर हो गए। कुछ घंटों में पानी ने इंसान की वर्षों की मेहनत को मिट्टी में मिला दिया।
हमने कहा—“प्रकृति का कहर है।”
लेकिन क्या कहानी इतनी ही है?
क्या प्रकृति को दोष देकर हम अपने सवालों से बच सकते हैं?
नहीं।
क्योंकि प्रकृति ने अचानक हमला नहीं किया। उसने वर्षों से संकेत दिए थे। पहाड़ों के बदलते मिजाज ने चेताया था। ग्लेशियरों के पिघलने ने चेताया था। नदियों के उफान ने चेताया था। भूस्खलनों ने चेताया था।
लेकिन हम विकास की रफ्तार में इतने अंधे हो गए कि चेतावनियां सुनाई ही नहीं दीं।
हमने पहाड़ों को सड़क समझ लिया और नदियों को नाला
आज इंसान पहाड़ पर सड़क चाहता है, नदी किनारे मकान चाहता है, जंगल के बीच रिसॉर्ट चाहता है और प्रकृति से हर सुविधा चाहता है।
लेकिन बदले में प्रकृति को क्या देता है?
कंक्रीट।
धुआं।
कचरा।
पेड़ों की कटाई।
नदियों पर अतिक्रमण।
और पहाड़ों का सीना चीरती मशीनें।
जिस पहाड़ ने सदियों से हमारी रक्षा की, उसी पहाड़ को हमने अपने स्वार्थ के लिए काटना शुरू कर दिया।
जिस नदी ने पीढ़ियों को जीवन दिया, उसी नदी के बहाव क्षेत्र में हमने निर्माण खड़े कर दिए।
फिर जब वही नदी अपने पुराने रास्ते पर लौटती है तो हम उसे “विनाशकारी” कह देते हैं।
सवाल यह है—
क्या नदी दोषी है या हमने नदी का रास्ता छीन लिया?
प्रकृति बदला नहीं लेती, हिसाब बराबर करती है
प्रकृति किसी से बदला नहीं लेती।
वह सिर्फ अपना संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है।
हमने जंगल काटे तो मिट्टी कमजोर हुई।
हमने पहाड़ काटे तो ढलान अस्थिर हुए।
हमने नदियों के रास्ते रोके तो पानी ने नया रास्ता खोज लिया।
हमने वातावरण गर्म किया तो हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और ग्लेशियरों पर उसका असर पड़ा।
और जब यह पूरा असंतुलन एक साथ सामने आया, तो हमने उसे “प्राकृतिक आपदा” कह दिया।
कितना सुविधाजनक है इंसान के लिए!
गलती हमारी हो तो भी दोष प्रकृति का।
सबसे बड़ा खतरा पानी नहीं, हमारी भूल है
बाढ़ आती है तो पानी दिखाई देता है।
लेकिन उसके पीछे छिपी गलतियां दिखाई नहीं देतीं।
नदी के किनारे अवैध निर्माण दिखाई नहीं देते।
पेड़ों की कटाई दिखाई नहीं देती।
पहाड़ों पर बिना पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन के किए गए निर्माण दिखाई नहीं देते।
आपदा से पहले की हमारी लापरवाही दिखाई नहीं देती।
और फिर जब तबाही सामने आती है तो हम राहत सामग्री लेकर पहुंच जाते हैं।
लेकिन सवाल यह है—
राहत बांटने से ज्यादा जरूरी आपदा को रोकने की कोशिश क्यों नहीं होती?
हर बार शवों की गिनती के बाद ही हमारी आंख क्यों खुलती है?
हर बार घर उजड़ने के बाद ही हमारी योजनाएं क्यों बनती हैं?
नेपाल सिर्फ नेपाल नहीं है
आज नेपाल में जो हुआ, उसे नेपाल की सीमा में कैद करके देखना खतरनाक भूल होगी।
हिमालय किसी एक देश की संपत्ति नहीं है।
उसकी चोट का असर सीमाओं से बाहर जाता है।
भारत के उत्तराखंड से लेकर हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश तक हिमालयी क्षेत्र हमें लगातार चेतावनी दे रहा है।
यदि हमने पहाड़ों के साथ खिलवाड़ जारी रखा तो अगली त्रासदी का नाम कोई दूसरा शहर, कोई दूसरा गांव या कोई दूसरा देश हो सकता है।
आज नेपाल है, कल कौन?
यह सवाल डराने के लिए नहीं है।
यह आने वाली पीढ़ियों को बचाने के लिए है।
विकास चाहिए, लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं
कोई भी समझदार व्यक्ति विकास का विरोध नहीं कर सकता।
सड़कें चाहिएं।
बिजली चाहिए।
रोजगार चाहिए।
पर्यटन चाहिए।
आधुनिक सुविधाएं चाहिएं।
लेकिन विकास और विनाश के बीच एक महीन रेखा होती है।
जब हम उस रेखा को पार कर जाते हैं, तब विकास की चमक के पीछे विनाश का अंधेरा छिप जाता है।
ऐसा विकास किस काम का जो आज सुविधा दे और कल पूरी बस्ती को खतरे में डाल दे?
हमें विकास रोकना नहीं है।
हमें विकास का तरीका बदलना है।
अब सरकारों से भी सवाल होना चाहिए और हमसे भी
सरकारों से पूछा जाना चाहिए—
क्या संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण की अनुमति वैज्ञानिक अध्ययन के बाद दी जा रही है?
क्या ग्लेशियरों और पर्वतीय झीलों की नियमित निगरानी हो रही है?
क्या स्थानीय लोगों तक समय रहते चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था पर्याप्त है?
क्या नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र सुरक्षित हैं?
और हमसे भी पूछा जाना चाहिए—
क्या हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं?
क्या हम जंगल बचाने के लिए तैयार हैं?
क्या हम नदी में कचरा डालना बंद करेंगे?
क्या हम हर खाली जमीन पर कंक्रीट खड़ा करने की मानसिकता बदलेंगे?
अब भी नहीं जागे तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा
नेपाल की त्रासदी को कुछ दिनों की खबर बनाकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी।
मृतकों को श्रद्धांजलि देना जरूरी है।
पीड़ितों की मदद करना जरूरी है।
लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है सबक लेना।
हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें पहाड़ों की निगरानी हो, ग्लेशियरों का वैज्ञानिक अध्ययन हो, आपदा की पूर्व चेतावनी गांव-गांव तक पहुंचे और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण प्रकृति की क्षमता को ध्यान में रखकर हो।
क्योंकि—
आपदा आने के बाद राहत देना मानवीय कर्तव्य है,
लेकिन आपदा से पहले सावधानी बरतना शासन और समाज की जिम्मेदारी है।
आखिरी सवाल
नेपाल की त्रासदी के सामने खड़े होकर यदि हम सिर्फ इतना कह दें कि—
“प्रकृति का कहर था।”
तो शायद हमने सबसे बड़ा सच देखने से इनकार कर दिया।
प्रकृति ने अपना काम किया।
हमने अपना कितना काम किया?
यही असली सवाल है।
क्योंकि प्रकृति को हराना इंसान के बस में नहीं है।
लेकिन प्रकृति के साथ जीना हमारे हाथ में है।
नदियों को रास्ता दीजिए।
पहाड़ों को सांस लेने दीजिए।
जंगलों को बचाइए।
ग्लेशियरों को समझिए।
विकास को वैज्ञानिक बनाइए।
और आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ इमारतें नहीं, जीने लायक धरती दीजिए।
वरना एक दिन हमारे बच्चे हमसे पूछेंगे—
“जब पहाड़ टूट रहे थे, नदियां चेतावनी दे रही थीं और प्रकृति बार-बार पुकार रही थी, तब आप लोग कर क्या रहे थे?”
उस दिन हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा।
नेपाल आज हमें आवाज दे रहा है।
सवाल यह नहीं कि हमने वह आवाज सुनी या नहीं।
सवाल यह है—
क्या हम अब भी जागेंगे?
— सूर्य नारायण पाण्डेय