लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे, जो उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख शहरों के बीच यात्रा के समय को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजना के रूप में शुरू किया गया था, वर्तमान में एक गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। इस आधुनिक और तीव्र मार्ग पर यात्रियों का विश्वास डगमगाता प्रतीत हो रहा है, जिसका प्रमाण यह है कि लगभग 30 प्रतिशत वाहन पुनः पुराने राष्ट्रीय राजमार्ग की ओर लौट रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल एक्सप्रेसवे की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि राज्य के बुनियादी ढांचे के विकास की सफलता के लिए भी एक चेतावनी है। इस बदलाव का एक मुख्य कारण पुराना राष्ट्रीय राजमार्ग है, जो दशकों से लखनऊ और कानपुर के बीच संपर्क का मुख्य माध्यम रहा है। इस मार्ग की अपनी एक ऐतिहासिक और व्यावहारिक पहचान है। पीढ़ियों से यात्री इस रास्ते से परिचित हैं, और उन्हें इसकी हर मोड़, हर सर्विस लेन और हर संभावित बाधा का ज्ञान है। यह परिचितता एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा प्रदान करती है, भले ही इसमें यात्रा का समय अधिक लगता हो। एक्सप्रेसवे, अपनी आधुनिकता के बावजूद, यात्रियों के लिए एक नई और अनिश्चित इकाई बना हुआ है, और जब यह अनिश्चितता बढ़ती है, तो लोग अपने पुराने और विश्वसनीय मार्ग की ओर लौटने लगते हैं। एक्सप्रेसवे के निर्माण के समय, इससे जुड़ी अपेक्षाएं बहुत अधिक थीं। यात्रियों को समय की महत्वपूर्ण बचत, बेहतर सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं का आश्वासन दिया गया था। एक्सप्रेसवे को प्रगति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जो इन दो आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण शहरों के बीच व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देगा। प्रारंभिक उत्साह के दौर में कई लोगों ने इस मार्ग को अपनाया। हालांकि, वर्तमान आंकड़े एक अलग कहानी बयां कर रहे हैं, जो यह संकेत देते हैं कि प्रारंभिक वादों और वर्तमान वास्तविकता के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो गया है, जिससे जनता का विश्वास कम हो रहा है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि लगभग 30 प्रतिशत यात्री पुनः पुराने मार्ग पर लौट आए हैं। यह केवल एक छोटा आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण संकेत है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह संख्या दर्शाती है कि यात्रियों के एक बड़े वर्ग ने एक्सप्रेसवे की वर्तमान स्थिति में कुछ ऐसा पाया है जो उन्हें असंतोषजनक लगा। यह बदलाव न केवल एक्सप्रेसवे के राजस्व को प्रभावित कर रहा है, बल्कि पुराने राजमार्ग पर यातायात के दबाव को भी बढ़ा रहा है, जिससे वहां जाम की स्थिति पैदा हो सकती है। यह स्थिति प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर गहन जांच की मांग करती है कि आखिर यात्रियों को एक्सप्रेसवे पर कौन सी कमी महसूस हो रही है। इस प्रवृत्ति के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। प्रशासनिक खामियां, जैसे कि टोल बूथों पर लंबा इंतजार या खराब रखरखाव, यात्रियों को हतोत्साहित कर सकते हैं। सुरक्षा संबंधी चिंताएं, जैसे कि अपर्याप्त प्रकाश व्यवस्था या निगरानी की कमी, भी एक प्रमुख कारक हो सकती हैं। इसके अलावा, एक्सप्रेसवे पर यात्री सुविधाओं, जैसे कि स्वच्छ शौचालय, भोजन के विकल्प और आपातकालीन सेवाओं की अनुपलब्धता भी लोगों को पुराने मार्ग की ओर धकेल सकती है, जहां ऐसी सुविधाएं अधिक सुलभ हैं। टोल की दरें भी एक ऐसा कारक हो सकती हैं जिसकी तुलना यात्री पुराने मार्ग की 'मुफ्त' यात्रा से करते हैं, भले ही वहां समय अधिक खर्च होता हो। यह स्थिति न केवल एक्सप्रेसवे के लिए, बल्कि राज्य की बुनियादी ढांचे की प्राथमिकताओं के लिए भी एक चुनौती है। एक बहु-करोड़ की परियोजना का कम उपयोग होना संसाधनों की बर्बादी है। प्रशासन को तत्काल इस पर ध्यान देना चाहिए और यात्रियों की शिकायतों को समझने के लिए एक व्यवस्थित सर्वेक्षण करना चाहिए। एक्सप्रेसवे की सुरक्षा, रखरखाव और सुविधाओं में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। जनता का विश्वास बहाल करना ही इस परियोजना की सफलता की कुंजी है, और इसके लिए पारदर्शी संचार और त्वरित कार्रवाई अनिवार्य है। जब तक यात्रियों का विश्वास नहीं लौटेगा, लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे केवल एक आधुनिक सड़क बनकर रह जाएगा, जो अपनी वास्तविक क्षमता को प्राप्त करने में असमर्थ होगा।