कानपुर!
एक शहर धीरे-धीरे मर रहा है और जिम्मेदार कुर्सियों पर बैठे तमाशा देख रहे हैं!
संपादकीय | लेखक: सूर्य नारायण पाण्डेय
कानपुर!
आज तुम्हें देखकर मन में गर्व नहीं, दर्द उठता है।
जिस शहर की पहचान कभी उद्योग, मेहनत और जिंदादिली से थी, आज वही शहर अव्यवस्था, जाम, गंदगी, अतिक्रमण, टूटती सड़कों और बदहाल यातायात के बीच कराहता दिखाई देता है।
आखिर किसने मार दी तुम्हारी रेढ ?
किसने तुम्हारे फुटपाथ छीन लिए?
किसने तुम्हारी सड़कों को जाम के हवाले कर दिया?
किसने तुम्हारी नालियों को कूड़े से भर दिया?
किसने तुम्हारी हवा में धूल और धुआं भर दिया?
और सबसे बड़ा सवाल—
किसने जिम्मेदारी को फाइलों के नीचे दबा दिया?
यह सवाल किसी एक अधिकारी, किसी एक विभाग या किसी एक सरकार से नहीं है।
यह सवाल उस पूरी व्यवस्था से है, जिसके पास अधिकार तो बहुत हैं, लेकिन जवाबदेही दिखाई नहीं देती।
कानपुर की सड़क पर निकल जाइए।
कहीं सड़क पर कब्जा है, कहीं फुटपाथ गायब है, कहीं पार्किंग की जगह बाजार बन चुका है। कहीं कूड़ा पड़ा है तो कहीं नाला अपनी गंदगी के साथ सड़क तक पहुंच चुका है।
और जब बारिश होती है तो शहर के कई हिस्से यह याद दिलाने लगते हैं कि नालों की सफाई कागज पर कितनी हुई और जमीन पर कितनी।
फिर जाम लगता है।
एम्बुलेंस फंसती है।
स्कूल जाने वाला बच्चा परेशान होता है।
दुकानदार परेशान होता है।
नौकरी पर जाने वाला कर्मचारी परेशान होता है।
और आम आदमी?
वह रोज अपना समय, अपना पेट्रोल, अपना धैर्य और कभी-कभी अपनी जान तक इस अव्यवस्था की कीमत के रूप में देता है।
लेकिन व्यवस्था चलती रहती है।
बैठक होती है।
निर्देश जारी होते हैं।
निरीक्षण होता है।
फोटो खिंचती है।
फिर कुछ दिन बाद वही कहानी।
तो क्या हमारी व्यवस्था का मतलब केवल "कार्रवाई की गई" लिख देना रह गया है?
अगर कार्रवाई के बाद भी समस्या वहीं खड़ी है तो सवाल पूछना जरूरी है—
कार्रवाई किस पर हुई और बदलाव कहां हुआ?
कानपुर को केवल योजनाओं की जरूरत नहीं है।
कानपुर को जिम्मेदार अधिकारियों की जरूरत है।
ऐसे अधिकारियों की, जो वातानुकूलित कमरों से नहीं बल्कि शहर की सड़कों पर उतरकर शहर को देखें।
ऐसे जनप्रतिनिधियों की, जो सिर्फ उद्घाटन के समय नहीं बल्कि जनता की परेशानी के समय भी दिखाई दें।
ऐसी व्यवस्था की, जिसमें किसी सड़क का गड्ढा केवल तब न भरे जब कोई बड़ी दुर्घटना हो जाए।
किसी नाले की सफाई केवल तब न हो जब बारिश सिर पर आ जाए।
किसी अतिक्रमण पर कार्रवाई केवल तब न हो जब तस्वीरें अखबार और सोशल मीडिया में वायरल हो जाएं।
शहर को हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले बचाना होगा।
लेकिन जिम्मेदारी केवल सरकार की भी नहीं है।
हम नागरिक भी कम दोषी नहीं हैं।
हम ही सड़क किनारे कूड़ा फेंकते हैं।
हम ही फुटपाथ घेरते हैं।
हम ही गलत दिशा में वाहन चलाते हैं।
हम ही पार्किंग के नियम तोड़ते हैं।
फिर उसी व्यवस्था को गाली देते हैं, जिसे कमजोर करने में हमारी भी भूमिका होती है।
कानपुर की बीमारी केवल सरकारी नहीं है—यह सामाजिक भी है।
लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि जिम्मेदार विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं।
जिसके पास अधिकार है, उसके पास जवाबदेही भी होनी चाहिए।
जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके शहर के लिए कितने वादे हुए, कितनी योजनाएं बनीं, कितना पैसा खर्च हुआ और जमीन पर उसका परिणाम क्या निकला।
अब समय आ गया है कि कानपुर में "कौन जिम्मेदार है?" यह सवाल हर स्तर पर पूछा जाए।
और जवाब भी मांगा जाए।
क्योंकि यह सिर्फ सड़क का सवाल नहीं है।
यह उस मां का सवाल है जो अपने बच्चे को स्कूल भेजते हुए डरती है।
यह उस मरीज का सवाल है जिसकी एंबुलेंस जाम में फंस जाती है।
यह उस बुजुर्ग का सवाल है जो टूटे फुटपाथ पर गिर सकता है।
यह उस मजदूर का सवाल है जिसकी दिनभर की कमाई का हिस्सा जाम में पेट्रोल बनकर जल जाता है।
यह उस व्यापारी का सवाल है जिसका कारोबार अव्यवस्था से प्रभावित होता है।
और यह उस हर कानपुरवासी का सवाल है जो अपने शहर से प्यार करता है।
कानपुर को मरने मत दीजिए।
इस शहर की धड़कन अभी बाकी है।
इसे फिर से साफ किया जा सकता है।
सड़कों को व्यवस्थित किया जा सकता है।
फुटपाथ वापस लिए जा सकते हैं।
नालों को साफ रखा जा सकता है।
अतिक्रमण नियंत्रित किया जा सकता है।
यातायात सुधारा जा सकता है।
लेकिन इसके लिए भाषण नहीं चाहिए।
इच्छाशक्ति चाहिए।
ईमानदार निगरानी चाहिए।
लगातार कार्रवाई चाहिए।
और सबसे जरूरी—
जवाबदेही चाहिए।
कानपुर किसी अधिकारी की निजी जागीर नहीं है।
किसी नेता की संपत्ति नहीं है।
किसी ठेकेदार का प्रयोगस्थल नहीं है।
यह जनता का शहर है।
जिस जनता के टैक्स से व्यवस्था चलती है, उसे बदले में सिर्फ आश्वासन नहीं चाहिए।
उसे परिणाम चाहिए।
आज जरूरत है कि शहर का हर जिम्मेदार व्यक्ति आईने के सामने खड़ा होकर खुद से एक सवाल पूछे—
"मैंने कानपुर के लिए वास्तव में क्या किया?"
अगर इस सवाल का जवाब देने में आंखें झुकती हैं तो अभी वक्त है।
कुर्सी छोड़ने का नहीं—जिम्मेदारी निभाने का।
क्योंकि आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी—
जब शहर बिगड़ रहा था तब तुम कहां थे?
जब सड़कें चीख रही थीं तब तुम कहां थे?
जब नालियां गंदगी से भर रही थीं तब तुम कहां थे?
जब आम आदमी जाम में अपना समय और जिंदगी गंवा रहा था तब तुम कहां थे?
और उस दिन सिर्फ एक जवाब बचा तो वह होगा—
हम देखते रहे।
कानपुर को देखने वाले नहीं चाहिए।
कानपुर को बदलने वाले चाहिए।
अब शहर को आश्वासन नहीं—
काम चाहिए।
अब जनता को भाषण नहीं—
हिसाब चाहिए।
अब कानपुर को वादे नहीं—
व्यवस्था चाहिए।
वरना याद रखिए—
शहर एक दिन में बर्बाद नहीं होता।
वह रोज थोड़ी-थोड़ी लापरवाही से मरता है।
और आज सवाल यह नहीं कि—
"कानपुर की हालत खराब क्यों है?"
आज असली सवाल यह है—
"कानपुर को इस हालत तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?"
—सूर्य नारायण पाण्डेय संपादकीय | पुलिस प्रहरी
कानपुर किसने मार दी तुम्हारी रेढ ?

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