एक तमाचा, सौ सवाल और लोकतंत्र के गाल पर पड़ा निशान
जब वर्दी कानून की रखवाली से आगे बढ़कर कानून की व्याख्या करने लगे, तो आम आदमी जाए तो जाए कहाँ?
संपादकीय | सूर्य नारायण पाण्डेय
लोकतंत्र में कहा जाता है—कानून सबसे ऊपर है।
लेकिन कभी-कभी सड़क पर निकलकर लगता है कि यह वाक्य संविधान की किताब में तो बिल्कुल ठीक है, बस जमीन पर इसका पता थोड़ा खो गया है।
एक चौराहे पर एक आम आदमी ने पुलिसकर्मी से पूछ लिया—
“साहब, कानून क्या कहता है?”
जवाब आया—
“जो हम कह रहे हैं।”
आदमी ने मासूमियत से पूछा—
“लेकिन कानून की किताब में तो कुछ और लिखा है?”
साहब मुस्कुराए।
बोले—
“किताब पढ़ने की आदत छोड़ो। किताब सवाल पैदा करती है।”
आदमी बोला—
“सवाल करना तो नागरिक का अधिकार है।”
साहब ने कहा—
“अच्छा! बहुत अधिकार याद हैं तुम्हें।”
और फिर—
चटाक!
एक तमाचा।
गाल पर पड़ा था, लेकिन आवाज इतनी तेज थी कि लगा जैसे लोकतंत्र के कान के पास किसी ने ताली बजा दी हो।
आदमी ने गाल सहलाया और पूछा—
“साहब, यह तमाचा किस धारा में आता है?”
साहब बोले—
“धारा मत पूछो।”
“क्यों?”
“क्योंकि यह कानून की नहीं… व्यवस्था की भाषा है।”
भीड़ खामोश थी।
तभी एक बुजुर्ग बोले—
“बेटा, पुलिस कानून नहीं है।”
साहब ने पूछा—
“आप वकील हैं?”
“नहीं।”
“जज?”
“नहीं।”
“फिर?”
बुजुर्ग ने कहा—
“नागरिक हूं।”
बस इतना सुनना था कि चौराहे की हवा बदल गई।
क्योंकि नागरिक होना आज भी इस देश में कोई छोटा पद नहीं है।
वर्दी बड़ी है या कानून?
यह सवाल किसी एक पुलिसकर्मी से नहीं है।
यह सवाल उस मानसिकता से है जो कभी-कभी वर्दी को कानून का पर्याय समझ बैठती है।
पुलिस हमारे समाज की जरूरत है।
पुलिस के बिना कानून-व्यवस्था की कल्पना मुश्किल है।
पुलिसकर्मी धूप में खड़ा होता है, रात में ड्यूटी करता है, अपराधियों से भिड़ता है, त्योहारों में घर से दूर रहता है।
इसलिए पुलिस का सम्मान होना चाहिए।
लेकिन—
सम्मान और निरंकुशता में जमीन-आसमान का फर्क है।
वर्दी सम्मान देती है।
मनमानी का अधिकार नहीं।
कानून शक्ति देता है।
कानून से ऊपर उठने की छूट नहीं।
तमाचा सिर्फ गाल पर नहीं पड़ता
किसी नागरिक के गाल पर पड़ा एक तमाचा सिर्फ दर्द नहीं देता।
वह कई सवाल छोड़ जाता है।
क्या गरीब नागरिक भी वही सम्मान पाएगा जो रसूखदार को मिलता है?
क्या पुलिस की गलती पर भी वही तत्परता दिखाई जाएगी जो आम आदमी की गलती पर दिखाई जाती है?
क्या थाने में शिकायतकर्ता की बात पहले सुनी जाएगी या पहले उसकी औकात पूछी जाएगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या वर्दी के सामने संविधान की आवाज धीमी हो जाती है?
अगर जवाब “नहीं” है तो बहुत अच्छी बात है।
फिर हर पुलिसकर्मी को यह समझना होगा कि उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका डंडा नहीं, कानून है।
और अगर जवाब “हां” है…
तो फिर हमें ईमानदारी से मान लेना चाहिए कि लोकतंत्र की किताब अलमारी में सुरक्षित है, मगर उसकी आत्मा सड़क पर असुरक्षित।
थाने में कानून की किताब जरूर रखिए
थाने में हथकड़ी होनी चाहिए।
डंडा भी होना चाहिए।
सरकारी गाड़ी भी होनी चाहिए।
लेकिन इनके साथ एक चीज और हमेशा सामने होनी चाहिए—
कानून की किताब।
ताकि कोई नागरिक पूछे—
“मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?”
तो जवाब मिले—
“क्योंकि कानून में इसकी यह व्यवस्था है।”
न कि—
“क्योंकि मैं पुलिस हूं।”
इन दोनों जवाबों के बीच ही लोकतंत्र और डर का अंतर छिपा हुआ है।
और अगर पुलिस ही कानून बन गई तो?
फिर जज की जरूरत क्यों?
अदालत की जरूरत क्यों?
वकील की जरूरत क्यों?
कानून की किताब की जरूरत क्यों?
साक्ष्य की जरूरत क्यों?
और सबसे बढ़कर—
न्याय की जरूरत क्यों?
अगर फैसला सड़क पर वर्दी करेगी, तो अदालत में कुर्सियां किसके लिए बचेंगी?
अगर अपराध तय करने का अधिकार मौके पर ही मिल गया, तो न्यायिक प्रक्रिया किस संग्रहालय में रखी जाएगी?
और अगर सवाल पूछने का परिणाम तमाचा है…
तो अगली पीढ़ी सवाल पूछना सीखेगी या सिर्फ सिर झुकाना?
पुलिस से सवाल पुलिस विरोध नहीं है
यह बात भी साफ होनी चाहिए।
पुलिस से सवाल करना पुलिस का अपमान नहीं है।
बल्कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस से सवाल करना उसी व्यवस्था को मजबूत करता है।
क्योंकि जवाबदेह पुलिस कमजोर पुलिस नहीं होती।
वह ज्यादा भरोसेमंद पुलिस होती है।
जिस पुलिसकर्मी को पता है कि उसकी हर कार्रवाई कानून और प्रक्रिया के दायरे में है, वह नागरिक के लिए डर नहीं—विश्वास बनता है।
आखिरी बात
उस चौराहे का तमाचा शायद कुछ मिनट में भूल जाएगा।
गाल का दर्द भी चला जाएगा।
लेकिन सवाल रह जाएगा—
“पुलिस कानून की रखवाली करेगी या खुद कानून बन बैठेगी?”
यह सवाल किसी एक थाने का नहीं।
किसी एक जिले का नहीं।
किसी एक वर्दी का नहीं।
यह सवाल पूरे लोकतंत्र का है।
क्योंकि लोकतंत्र में—
पुलिस शक्तिशाली हो सकती है,
लेकिन कानून से बड़ी नहीं।
अधिकारी प्रभावशाली हो सकता है,
लेकिन संविधान से बड़ा नहीं।
आम आदमी कमजोर हो सकता है,
लेकिन उसके अधिकार छोटे नहीं।
और याद रखिए—
तमाचा अगर अपराधी के खिलाफ कानून की प्रक्रिया में पड़े तो वह कार्रवाई हो सकती है;
लेकिन अगर तमाचा कानून की जगह ले ले, तो वह व्यवस्था पर सवाल बन जाता है।
इसलिए अगली बार जब कोई चौराहे पर पूछे—
“साहब, कानून क्या कहता है?”
तो जवाब यह होना चाहिए—
“कानून वही कहता है जो किताब में लिखा है—और हम उसी कानून को लागू करने के लिए हैं।”
यही वर्दी की असली ताकत है।
यही पुलिस की असली प्रतिष्ठा है।
और यही लोकतंत्र की असली पहचान है।
क्योंकि पुलिस कानून की रखवाली करती है…
पुलिस खुद कानून नहीं है।
— सूर्य नारायण पाण्डेय
संपादक, पुलिस प्रहरी
पुलिस ही कानून है........?

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