शिक्षक दिवस पर फूलों का गुलदस्ता नहीं, खुद से एक सवाल कीजिए—जिस शिक्षक ने समाज बनाया, क्या समाज ने उसका सम्मान बचाए रखा है?

आज शिक्षक दिवस है।
सोशल मीडिया पर हजारों संदेश दिखाई देंगे—“गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर है।” स्कूलों में कार्यक्रम होंगे, बच्चे भाषण देंगे, शिक्षक सम्मानित होंगे और तस्वीरें खिंचेंगी।

लेकिन कल?

कल वही शिक्षक फिर फाइलों, रिपोर्टों, सरकारी आदेशों, गैर-शैक्षणिक कामों और व्यवस्था की उम्मीदों के बीच कहीं दब जाएगा। जिस व्यक्ति से हम देश का भविष्य गढ़ने की उम्मीद करते हैं, क्या हमने उसे भविष्य गढ़ने का पर्याप्त समय भी दिया है?

यह कैसी विडंबना है कि हम डॉक्टर को मरीज बचाने वाला, इंजीनियर को निर्माण करने वाला और अधिकारी को व्यवस्था चलाने वाला मानते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि इन सभी को बनाने वाला शिक्षक ही था।

एक शिक्षक बच्चे को केवल 'क ख ग' नहीं सिखाता। वह उसके भीतर सवाल पैदा करता है। वह गिरने के बाद उठना सिखाता है। वह हार के बाद फिर प्रयास करना सिखाता है। वह बताता है कि इंसान की असली पहचान उसके पद से नहीं, उसके चरित्र से होती है।

लेकिन आज शिक्षा भी बाजार की भाषा बोलने लगी है। स्कूलों की चमक बढ़ी है, फीस बढ़ी है, तकनीक बढ़ी है—पर क्या शिक्षा का संस्कार भी उतना ही बढ़ा है?

माता-पिता अपने बच्चों के अच्छे अंक पर गर्व करते हैं, लेकिन उनके अच्छे संस्कार पर कितनी बार गर्व करते हैं?

हम शिक्षक से बच्चे को शत-प्रतिशत अंक दिलाने की उम्मीद करते हैं, लेकिन क्या कभी उससे यह पूछा कि वह बच्चा एक अच्छा इंसान कैसे बनेगा?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या हम शिक्षक को वह सम्मान दे रहे हैं, जिसकी मांग हम अपने बच्चों के लिए करते हैं?

जिस समाज में शिक्षक की बात को सुनने से पहले उसकी हैसियत देखी जाने लगे, वहां शिक्षा कमजोर नहीं होती—पूरी पीढ़ी कमजोर होने लगती है।

शिक्षक की डांट को अपमान और अनुशासन को दखल समझने वाली मानसिकता आखिर हम किस दिशा में ले जा रहे हैं?

आज जरूरत शिक्षक दिवस मनाने की नहीं, शिक्षक के महत्व को समझने की है।

गुरु को साल में एक दिन फूल देने से सम्मान नहीं मिलता। सम्मान तब मिलेगा, जब पूरे साल उसके ज्ञान, अनुभव, अनुशासन और मेहनत को महत्व दिया जाएगा।

क्योंकि—

स्कूल की इमारत ईंट-पत्थरों से बनती है, लेकिन राष्ट्र की इमारत शिक्षक बनाता है।

और जिस दिन समाज ने अपने शिक्षकों को कमजोर कर दिया, उस दिन समझ लीजिए—हमने अपने भविष्य की नींव में ही दरार डाल दी है।

इस शिक्षक दिवस पर गुरु को प्रणाम जरूर कीजिए, लेकिन उससे भी पहले खुद से पूछिए—क्या हम सचमुच शिक्षक का सम्मान करते हैं, या सिर्फ 5 सितंबर को सम्मान करने का अभिनय करते हैं?

संपादकीय