संपादक की कलम से
✍️ संपादक — सूर्य नारायण पाण्डेय
किसी जिलाधिकारी का तबादला सरकारी फाइल में महज एक आदेश होता है। एक हस्ताक्षर होता है, एक नई जिम्मेदारी होती है और एक अधिकारी दूसरे जिले या विभाग की ओर बढ़ जाता है। लेकिन जब वही अधिकारी जनता की तकलीफ को सिर्फ फाइल का विषय न मानकर उसे अपनी जिम्मेदारी समझने लगे, जब उसकी सख्ती व्यवस्था के लिए हो और संवेदनशीलता आम आदमी के लिए—तब विदाई केवल प्रशासनिक घटना नहीं रह जाती, वह भावनात्मक क्षण बन जाती है।
कानपुर के जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह का स्थानांतरण हो गया है। जनवरी 2025 में कानपुर की कमान संभालने वाले जितेंद्र प्रताप सिंह अब राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद के निदेशक की जिम्मेदारी संभालेंगे। उनके स्थान पर महेंद्र सिंह तंवर को कानपुर का नया जिलाधिकारी बनाया गया है।
लेकिन सवाल यह है कि करीब डेढ़ वर्ष के इस कार्यकाल में डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह ने कानपुर को क्या दिया?
इस सवाल का जवाब केवल सरकारी योजनाओं की सूची में नहीं मिलेगा। इसका जवाब उन चेहरों पर मिलेगा जो जनता दर्शन से अपनी समस्या लेकर पहुंचे और जिन्हें लगा कि उनकी बात किसी ने सुनी है।
जनता दर्शन को बनाया संवाद का माध्यम
जितेंद्र प्रताप सिंह के कार्यकाल की सबसे उल्लेखनीय तस्वीर जनता दर्शन की रही। अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, नौ महीने में जनता दर्शन के माध्यम से दर्ज 16,439 शिकायतों में से 16,137 के समाधान का उल्लेख किया गया।
आंकड़ा सिर्फ आंकड़ा नहीं होता। उसके पीछे हजारों परिवारों की परेशानियां होती हैं—जमीन का विवाद, पेंशन की समस्या, पारिवारिक कलह, सरकारी दफ्तरों के चक्कर, किसान की शिकायत और गरीब की वह फरियाद जिसे कई बार सुनने वाला कोई नहीं मिलता।
यही वजह है कि जितेंद्र प्रताप सिंह की प्रशासनिक छवि में ‘जनता के बीच सीधे हस्तक्षेप’ का पहलू बार-बार सामने आया।
कभी टूटी गुल्लक ने कलेक्ट्रेट की कुर्सी को भावुक कर दिया
डीएम की कुर्सी अक्सर कठोर फैसलों के लिए जानी जाती है, लेकिन मई 2026 की वह घटना शायद उनके कार्यकाल की सबसे मानवीय तस्वीरों में गिनी जाएगी।
दो बच्चियां पारिवारिक विवाद के कारण अपनी टूटी गुल्लक की पीड़ा लेकर जनता दर्शन में पहुंचीं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, डीएम ने दोनों बच्चियों के लिए नई गुल्लक और स्कूल बैग मंगवाए तथा अपनी ओर से दोनों गुल्लकों में 500-500 रुपये डाले।
सोचिए...
जिस उम्र में बच्चों की दुनिया गुल्लक में जमा कुछ सिक्कों और स्कूल बैग के सपनों से बनती है, उस उम्र में अगर उनकी गुल्लक टूट जाए तो उनके लिए वह मामूली घटना नहीं होती।
और शायद यही वह क्षण था जब डीएम की कुर्सी पर बैठा अधिकारी नहीं, एक संवेदनशील इंसान सामने आया।
बुजुर्ग की पीड़ा भी सुनी, बच्चियों की मुस्कान भी देखी
जुलाई 2026 में जनता दर्शन में एक बुजुर्ग अपनी वैवाहिक जिंदगी की गंभीर समस्या लेकर पहुंचे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, डीएम ने मामले की जांच और काउंसलिंग के निर्देश दिए।
यानी जनता दर्शन सिर्फ कागजों पर शिकायत दर्ज कराने की जगह नहीं रहा। वहां कानपुर का वह आम नागरिक भी पहुंच सकता था जिसकी आवाज शायद किसी छोटे दफ्तर में दब जाती।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर सख्ती—और यहीं से शुरू हुआ विवाद
किसी भी जिलाधिकारी की असली परीक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था में होती है। क्योंकि अस्पताल की व्यवस्था खराब होने का मतलब किसी गरीब परिवार की जिंदगी पर सीधा असर है।
जितेंद्र प्रताप सिंह ने स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कई बैठकों और निरीक्षणों में अधिकारियों से जवाब मांगा। सितंबर 2025 की जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में उन्होंने स्वास्थ्य योजनाओं में लापरवाही पर नाराजगी जताई। रिपोर्ट के अनुसार, घाटमपुर सीएचसी में 1,178 बच्चों के टीकाकरण से वंचित रहने के मामले में जांच और जवाबदेही की प्रक्रिया के निर्देश दिए गए तथा गर्भवती महिलाओं के लिए स्वास्थ्य केंद्रों पर जरूरी जांच सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया।
यही सख्त रवैया आगे चलकर डीएम और तत्कालीन सीएमओ के बीच मतभेदों की खबरों का कारण भी बना। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डीएम ने सीएमओ को हटाने की संस्तुति शासन को भेजी थी, जबकि कुछ जनप्रतिनिधियों ने सीएमओ के पक्ष में अलग राय रखी। यह विवाद सार्वजनिक बहस का विषय बना, लेकिन इसे लेकर अलग-अलग पक्षों के दावे रहे हैं।
लेकिन सितंबर 2026 की एक और घटना उनके स्वास्थ्य व्यवस्था संबंधी रुख को समझने में मदद करती है। पटारा सीएचसी में सुविधाओं और उपचार में देरी की शिकायतों के बाद उन्होंने पूरे स्टाफ को बदलने के निर्देश दिए, तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई और प्रभावित परिवार के लिए 16 लाख रुपये की आर्थिक सहायता की घोषणा की।
यही उनका प्रशासनिक अंदाज था—शिकायत मिली तो सिर्फ फाइल नहीं, मौके तक पहुंचना; कमी मिली तो सवाल करना; और जरूरत पड़ी तो जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू करना।
धर्म और संस्कृति से भी जुड़ा रहा प्रशासन
कानपुर सिर्फ सरकारी दफ्तरों का शहर नहीं है। यह मंदिरों, गुरुद्वारों, घाटों, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक आयोजनों की जीवंत नगरी है।
जितेंद्र प्रताप सिंह ने धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में सहभागिता दिखाई। सिंधी समाज के चालिहा पर्व जैसे कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के साथ संवाद की तस्वीरें सामने आईं। कानपुर की धार्मिक विरासत और पर्यटन को जोड़ने की दिशा में बिठूर, घाटमपुर और बिल्हौर को धार्मिक पर्यटन सर्किट से जोड़ने की योजनाओं की भी चर्चा उनके कार्यकाल में हुई।
यह सहभागिता केवल मंच पर बैठने तक सीमित नहीं थी। इसका एक संदेश था—प्रशासन जनता से अलग कोई व्यवस्था नहीं, बल्कि जनता के साथ चलने वाली व्यवस्था है।
सख्त अधिकारी, लेकिन कठोर दिल नहीं
जितेंद्र प्रताप सिंह के बारे में हालिया विदाई रिपोर्टों में उनकी पहचान सख्त प्रशासनिक फैसलों और आम लोगों की समस्याओं में सीधे हस्तक्षेप करने वाले अधिकारी के रूप में सामने आई है। निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, विभागीय लापरवाही और भ्रष्टाचार संबंधी मामलों में कार्रवाई को लेकर भी उनके कार्यकाल की चर्चा हुई।
यही विरोधाभास उनकी कार्यशैली को अलग बनाता है।
अधिकारी के रूप में सख्ती—इंसान के रूप में संवेदनशीलता।
एक तरफ सरकारी कर्मचारी से जवाब मांगने वाला डीएम और दूसरी तरफ किसी बच्ची की गुल्लक में अपनी जेब से पैसे डालने वाला इंसान।
शायद प्रशासन की यही दो तस्वीरें उनके कार्यकाल को समझने की सबसे बड़ी कुंजी हैं।
कानपुर पूछेगा—साहब, अब कौन सुनेगा?
तबादले के बाद नया अधिकारी आएगा। नई प्राथमिकताएं होंगी। नई कार्यशैली होगी। प्रशासन चलता रहेगा।
लेकिन जिन लोगों ने जनता दर्शन में अपनी बात रखी, जिन बच्चों ने कलेक्ट्रेट में अपनापन महसूस किया, जिन परिवारों को प्रशासनिक मदद मिली और जिन अधिकारियों ने उनके सख्त निर्देशों का सामना किया—उन सबके लिए जितेंद्र प्रताप सिंह का कार्यकाल एक अलग अध्याय रहेगा।
किसी अधिकारी की असली परीक्षा यह नहीं कि उसके नाम कितने सरकारी आदेश जारी हुए।
असली परीक्षा यह है कि उसके जाने के बाद कितने लोग यह कहते हैं—“साहब, हमारी बात सुनी थी।”
और शायद यही वजह है कि जितेंद्र प्रताप सिंह की विदाई को सिर्फ तबादले की खबर मानना कानपुर की उस भावना को छोटा करना होगा जो उनके कार्यकाल से जुड़ी है।
कानपुर से डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह चले गए हैं,
लेकिन जनता दर्शन की वे कुर्सियां,
बच्चियों की वे गुल्लकें,
बुजुर्गों की वे फरियादें,
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उनकी सख्ती
और व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की उनकी कोशिशें—
उनकी प्रशासनिक कहानी का हिस्सा बन चुकी हैं।
कुर्सी बदलती है।
जिम्मेदारी बदलती है।
शहर बदल सकता है।
लेकिन अच्छे काम की चर्चा इतनी आसानी से नहीं बदलती।
कानपुर की मिट्टी से निकली इस विदाई में एक पत्रकार के रूप में मैं इतना ही कहूंगा—
“जितेंद्र प्रताप सिंह साहब,
आप कानपुर से जरूर जा रहे हैं,
लेकिन जिन लोगों की आवाज आपने सुनी है,
उनकी दुआओं से कोई तबादला आपको अलग नहीं कर सकता।”
नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं।
कानपुर आपको याद रखेगा।
— सूर्य नारायण पाण्डेय
संपादक, पुलिस प्रहरी
PolicePrahari.com