उत्तर प्रदेश इस समय भीषण गर्मी की मार झेल रहा है। तापमान कई जिलों में 40 से 46 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। सूरज की तपिश दिन में लोगों को झुलसा रही है, तो रात में बिजली कटौती लोगों की नींद और चैन दोनों छीन रही है। शहर हो या गांव, हर तरफ एक ही आवाज सुनाई दे रही है—“बिजली कब आएगी?”
आज हालत यह हो चुकी है कि कई इलाकों में 12 से 14 घंटे तक बिजली गायब रहती है। लोग पसीने से तरबतर होकर रातें काटने को मजबूर हैं। छोटे बच्चे गर्मी से रो रहे हैं, बुजुर्गों की सांसें फूल रही हैं और बीमार मरीज बिजली न होने के कारण सबसे अधिक परेशान हैं। जिन घरों में कूलर और पंखे हैं, वहां भी सब बेकार पड़े हैं क्योंकि बिजली ही नहीं है।
सबसे ज्यादा मुश्किल उन गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की है जो दिनभर मेहनत मजदूरी कर किसी तरह अपने घर का खर्च चलाते हैं। जब शाम को काम से थककर घर लौटते हैं तो उम्मीद होती है कि थोड़ा आराम मिलेगा, लेकिन बिजली कटौती उनकी बची-खुची ताकत भी छीन लेती है। अंधेरे और उमस में खाना बनाना किसी सजा से कम नहीं रह गया है। महिलाएं रसोई में पसीने से लथपथ होकर घंटों चूल्हे और गैस के सामने खड़ी रहती हैं।
यह केवल असुविधा का मामला नहीं है, बल्कि अब यह एक गंभीर सामाजिक और सुरक्षा का विषय बन चुका है। जैसे ही शाम होती है, कई मोहल्लों और गांवों में अंधेरा छा जाता है। सड़कों पर स्ट्रीट लाइट बंद हो जाती हैं। ऐसे में चोरी, लूटपाट और अन्य अपराधों की आशंका बढ़ जाती है। महिलाएं और बच्चे खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। आखिर जब पूरा शहर अंधेरे में डूबा हो तो सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत रह सकती है?
दूसरी ओर व्यापारी वर्ग भी भारी नुकसान झेल रहा है। दुकानों में ग्राहक कम हो रहे हैं क्योंकि गर्मी और अंधेरे में लोग घरों से निकलने से बचते हैं। छोटे उद्योग, वर्कशॉप, साइबर कैफे और ऑनलाइन काम करने वाले युवाओं का काम पूरी तरह प्रभावित हो रहा है। छात्रों की पढ़ाई चौपट हो रही है। परीक्षा की तैयारी कर रहे लाखों विद्यार्थी रात में मोमबत्ती और मोबाइल की टॉर्च के सहारे पढ़ने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी व्यवस्था अचानक इतनी कमजोर कैसे हो गई? क्या बिजली विभाग के पास गर्मी के इस मौसम की कोई तैयारी नहीं थी? हर साल मई और जून में भीषण गर्मी पड़ती है, फिर भी बिजली व्यवस्था हर बार क्यों चरमरा जाती है? क्या सरकार और विभाग केवल कागजों में योजनाएं बनाकर जनता को भरोसा दिलाने का काम करते हैं?
ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी और मंत्री वातानुकूलित कमरों में बैठकर आंकड़े प्रस्तुत कर सकते हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी कह रही है। जनता को भाषण नहीं, राहत चाहिए। लोगों को यह जानने का अधिकार है कि जब बिजली बिल लगातार बढ़ रहे हैं तो फिर व्यवस्था इतनी खराब क्यों है? आखिर कब तक जनता अंधेरे और गर्मी के बीच तड़पती रहेगी?
यह समय राजनीतिक बयानबाजी का नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई का है। सरकार को चाहिए कि बिजली उत्पादन और वितरण व्यवस्था को तुरंत दुरुस्त करे। जहां ट्रांसफार्मर खराब हैं उन्हें तत्काल बदला जाए। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए अलग-अलग आपातकालीन बिजली प्रबंधन योजना बनाई जाए। बिजली विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए ताकि जनता को केवल आश्वासन नहीं बल्कि वास्तविक राहत मिल सके।
उत्तर प्रदेश की जनता मेहनती है, संघर्ष करना जानती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह हर बार बदहाल व्यवस्था का बोझ चुपचाप सहती रहे। जब गर्मी जानलेवा हो जाए और बिजली जीवन की सबसे बड़ी जरूरत बन जाए, तब व्यवस्था की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार जनता की पीड़ा को महसूस करे। क्योंकि जब एक मां अपने बच्चे को गर्मी में तड़पते हुए देखती है, जब एक बुजुर्ग पूरी रात पसीने में जागता है, जब एक छात्र अंधेरे में भविष्य बनाने की कोशिश करता है—तब यह केवल बिजली कटौती नहीं रहती, बल्कि यह व्यवस्था की संवेदनहीनता का प्रतीक बन जाती है।
“तपती रातें, बुझते घर और तड़पती जनता: आखिर बिजली व्यवस्था कब सुधरेगी"??

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