प्रस्तावना
वर्तमान भौतिकी के अनुसार न्यूट्रिनो अत्यंत सूक्ष्म, लगभग द्रव्यमानहीन तथा अत्यंत कमजोर अंतःक्रिया करने वाले मूलभूत कण हैं। वे लगभग प्रकाश के वेग से चलते हैं और विशाल ग्रहों तथा तारों को भी लगभग बिना रुके पार कर सकते हैं।
मेरी परिकल्पना इससे एक कदम आगे जाती है।
मूल परिकल्पना
मैं यह परिकल्पना प्रस्तुत करता हूँ कि न्यूट्रिनो केवल ऊर्जा के कण नहीं हैं, बल्कि संभव है कि वे ब्रह्मांडीय सूचना (Cosmic Information) के भी वाहक हों।
संभव है कि प्रत्येक न्यूट्रिनो अपने अस्तित्व के दौरान निम्न प्रकार की सूचनाएँ किसी न किसी भौतिक रूप में धारण करता हो:
उसका उद्गम स्रोत।
उसकी ऊर्जा का स्तर एवं परिवर्तन।
उसकी गति एवं दिशा।
उसकी यात्रा का इतिहास।
जिन क्षेत्रों अथवा पदार्थों से वह होकर गुज़रा है, उनसे संबंधित सूक्ष्म प्रभाव।
ब्रह्मांडीय परिवेश की सूचना।
यदि ऐसा है, तो न्यूट्रिनो केवल कण नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के सूचना-वाहक (Information Carriers) भी हो सकते हैं।
चेतना से संभावित संबंध
मेरी परिकल्पना का अगला चरण यह है कि मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन्स अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर ऐसे कणों के साथ किसी अज्ञात प्रकार की अंतःक्रिया कर सकते हैं।
यदि भविष्य में ऐसी अंतःक्रिया का कोई भौतिक तंत्र खोजा जाता है, तो संभव है कि विचारों, अंतर्ज्ञान, प्रेरणा अथवा चेतना के कुछ पहलुओं को नए दृष्टिकोण से समझा जा सके।
मैं यह दावा नहीं करता कि यह प्रक्रिया सिद्ध हो चुकी है। यह केवल भविष्य के अनुसंधान हेतु प्रस्तुत एक वैज्ञानिक परिकल्पना है।
वर्तमान स्थिति
वर्तमान विज्ञान के पास ऐसा कोई प्रायोगिक प्रमाण नहीं है जो यह सिद्ध करे कि न्यूट्रिनो विचारों या चेतना का वहन करते हैं।
अतः यह परिकल्पना वर्तमान वैज्ञानिक सहमति से भिन्न है और इसकी सत्यता केवल भविष्य के प्रयोगों, गणितीय मॉडल तथा स्वतंत्र परीक्षणों से ही निर्धारित की जा सकती है।
निष्कर्ष
मानव सभ्यता का इतिहास बताता है कि अनेक महान खोजें पहले कल्पना, फिर परिकल्पना और अंततः प्रयोग द्वारा सिद्ध हुईं।
यदि यह परिकल्पना गलत सिद्ध होती है, तो भी उसके परीक्षण की प्रक्रिया न्यूट्रिनो, सूचना तथा चेतना के विज्ञान में नए प्रश्न और नई खोजों को जन्म दे सकती है।
यदि इसमें सत्य का कोई अंश है, तो संभव है कि भविष्य का विज्ञान पदार्थ, ऊर्जा, सूचना और चेतना के बीच आज से कहीं अधिक गहरे संबंधों को समझ सके।
विचारक श्री राकेश श्रीवास्तव "सरल"