लेखक: राकेश श्रीवास्तव
मानव सभ्यता ने सदियों तक ऊर्जा की खोज की है। हमने कोयला जलाया, तेल निकाला, गैस का उपयोग किया, नदियों को बाँधा और सूर्य से बिजली बनानी शुरू की। लेकिन आज एक नया प्रश्न हमारे सामने खड़ा है।
क्या केवल ऊर्जा प्राप्त करना ही पर्याप्त है, या पृथ्वी पर बढ़ती अतिरिक्त ऊष्मा का प्रबंधन करना भी हमारी जिम्मेदारी है?
आज दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और हीट वेव की समस्या से जूझ रही है। शहर कंक्रीट के जंगल बनते जा रहे हैं। हर वर्ष एयर कंडीशनरों की संख्या बढ़ रही है। वे हमें व्यक्तिगत आराम तो देते हैं, लेकिन अपने आसपास की हवा में अतिरिक्त ऊष्मा छोड़कर समस्या को और जटिल भी बनाते हैं। यह व्यक्तिगत सुविधा का समाधान है, सामाजिक समाधान नहीं।
मेरे मन में एक सरल विचार आया।
यदि सूर्य से आने वाली अतिरिक्त ऊष्मा हमारे पौधों को झुलसा रही है, मिट्टी को सुखा रही है और भवनों को गर्म कर रही है, तो क्या उसी ऊष्मा को किसी उपयोगी प्राकृतिक प्रक्रिया में लगाया जा सकता है?
प्रकृति का उत्तर हमारे सामने है।
एक वृक्ष गर्मी से लड़ता नहीं। वह अपनी जड़ों से जल ग्रहण करता है और पत्तियों द्वारा उसे वाष्पित करता है। यही वाष्पन उसके आसपास के वातावरण को संतुलित रखता है। एक नदी, एक तालाब, एक झरना और एक वन सभी इसी सिद्धांत पर कार्य करते हैं। वे अतिरिक्त ऊष्मा को जल के वाष्पन में परिवर्तित करते हैं।
यहीं से मेरे मन में Solar Evaporative Heat Sink System (SEHSS) की अवधारणा उत्पन्न हुई।
इसका उद्देश्य ऊर्जा उत्पन्न करना नहीं, बल्कि अतिरिक्त सौर ऊष्मा को नियंत्रित जल-वाष्पन में परिवर्तित करना है। यदि सूर्य से प्राप्त ऊष्मा का एक भाग पौधों को क्षति पहुँचाने के बजाय जल के वाष्पन में उपयोग हो, तो स्थानीय सूक्ष्म वातावरण अधिक संतुलित बनाया जा सकता है।
मेरे विचार में भविष्य का पर्यावरण प्रबंधन केवल वृक्ष लगाने तक सीमित नहीं रहेगा। हमें यह भी समझना होगा कि किसी घर, विद्यालय, पार्क या उद्योग क्षेत्र की शीतलन क्षमता (Cooling Capacity) कितनी है। कितनी हरियाली आवश्यक है? कितने जल की आवश्यकता है? कितनी कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित होगी? कितना ऑक्सीजन उत्पादन होगा? और स्थानीय तापमान में कितनी कमी लाई जा सकती है?
मैं यह भी मानता हूँ कि शहरों में उपलब्ध जल, विशेषकर उपचारित या पुनः उपयोग योग्य जल, यदि नियंत्रित वाष्पन प्रणालियों में लगाया जाए, तो यह केवल जल का उपयोग नहीं होगा, बल्कि अतिरिक्त ऊष्मा का प्रबंधन भी होगा।
भविष्य का विकास केवल ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) से नहीं, बल्कि ऊष्मा दक्षता (Heat Efficiency) से भी मापा जाएगा।
मेरा विश्वास है कि आने वाले समय में भवन निर्माण मानकों के साथ-साथ Green Cooling Standards भी विकसित होंगे, जिनमें प्रत्येक भवन के लिए न्यूनतम हरियाली, न्यूनतम वाष्पन क्षमता और न्यूनतम पर्यावरणीय शीतलन क्षमता निर्धारित की जाएगी।
यह विचार किसी अंतिम निष्कर्ष की घोषणा नहीं है। यह एक आमंत्रण है। वैज्ञानिकों, अभियंताओं, पर्यावरण विशेषज्ञों, नगर नियोजकों और समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक के लिए एक निमंत्रण कि वे बढ़ती गर्मी को केवल संकट न मानें, बल्कि उसके वैज्ञानिक और प्राकृतिक प्रबंधन पर भी विचार करें।
मेरा विश्वास है कि जिस दिन हम अतिरिक्त ऊष्मा को एक प्रबंधनीय संसाधन के रूप में देखना प्रारम्भ कर देंगे, उसी दिन पर्यावरण संरक्षण का एक नया अध्याय प्रारम्भ होगा।
प्रकृति हमें हर दिन सिखाती है कि संतुलन संघर्ष से नहीं, समन्वय से बनता है।
- राकेश श्रीवास्तव
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