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... विज्ञापन (कॉन्टेक्ट शिवांगी 9140194880) ... मंदिर की जमीन के विवाद से टूटी दोस्ती ने लिया खूनी मोड़, एमपी-एमएलए कोर्ट ने सुनाई सजा

औरैया। जिले के चर्चित अधिवक्ता मंजुल चौबे और उनकी शिक्षक बहन सुधा चौबे की हत्या के मामले में बुधवार को करीब छह साल बाद अदालत का फैसला आया। एमपी-एमएलए कोर्ट ने सपा के पूर्व एमएलसी कमलेश पाठक, उनके दो भाइयों समेत 10 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। फैसला आते ही लंबे समय से न्याय की राह देख रहे मृतक भाई-बहन के परिवार में राहत की भावना दिखाई दी।

मामला 15 जनवरी 2020 का है। औरैया में दिनदहाड़े मंजुल चौबे और उनकी बहन सुधा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जांच में हत्या के पीछे पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास स्थित करीब एक बीघा जमीन को लेकर चला आ रहा विवाद प्रमुख कारण के रूप में सामने आया। बताया जाता है कि कभी कमलेश पाठक और मंजुल चौबे के बीच बेहद करीबी दोस्ती थी, लेकिन राजनीतिक मतभेद और जमीन के विवाद ने दोनों के रिश्ते पूरी तरह बदल दिए।

विवाद के दौरान हुई थी फायरिंग

पुलिस के मुताबिक वारदात के दिन कमलेश पाठक विवादित जमीन पर कुर्सी डालकर बैठे थे। इसी दौरान मंजुल के पिता से कहासुनी हो गई। देखते ही देखते विवाद बढ़ गया और दोनों पक्षों के लोग मौके पर पहुंच गए। आरोप है कि इसी दौरान कमलेश के भाई संतोष और गनर भी वहां आ गए तथा फायरिंग हुई। गोली लगने से मंजुल और सुधा की मौके पर ही मौत हो गई।

घटना के बाद पुलिस ने कमलेश पाठक, उनके भाइयों संतोष और राम सहित सात आरोपियों को उसी दिन गिरफ्तार किया था। अगले दिन भी गिरफ्तारियां हुईं। पुलिस ने कुल 11 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। इनमें एक आरोपी नाबालिग होने के कारण उसका मामला किशोर न्यायालय भेज दिया गया।

900 से ज्यादा तारीखों के बाद आया फैसला

इस मुकदमे की सुनवाई लगभग छह वर्षों तक चली। इस दौरान अदालत में 900 से अधिक तारीखें पड़ीं और अभियोजन तथा बचाव पक्ष की ओर से कुल 72 गवाह पेश किए गए। मंजुल के परिवार की तरफ से 33, जबकि कमलेश पक्ष की ओर से 39 गवाहों ने अदालत में बयान दर्ज कराए।

11 जुलाई 2020 को 10 आरोपियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई की गई थी। हालांकि गनर अवनीश प्रताप सिंह को गैंगस्टर एक्ट के मामले में बरी कर दिया गया था, जबकि दोहरे हत्याकांड का मुकदमा अपनी प्रक्रिया के तहत चलता रहा।

दोस्ती से दुश्मनी तक पहुंचा रिश्ता

भड़ारीपुर गांव निवासी कमलेश पाठक और मंजुल चौबे की कभी गहरी दोस्ती थी। मंजुल के छात्रसंघ अध्यक्ष बनने के दौरान कमलेश उनके साथ मजबूती से खड़े रहे। दोनों की नजदीकी का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता था कि मंजुल को कमलेश की परछाई तक कहा जाता था। बताया जाता है कि मंजुल का मकान भी कमलेश ने बनवाया था।

वर्ष 2006 के नगर पालिका चुनाव के दौरान दोनों के संबंधों में खटास शुरू हुई। इसके बाद राजनीतिक रास्ते अलग हुए और दूरी लगातार बढ़ती गई। पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास की जमीन को लेकर विवाद ने रही-सही कड़वाहट को भी गहरा कर दिया। मंजुल ने जमीन पर कमलेश के दावे का विरोध किया और यही विवाद बाद में हिंसक टकराव में बदल गया।

राजनीति में भी रहा लंबा सफर

कमलेश पाठक कम उम्र में ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे। वह समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेताओं के करीबी माने जाते रहे। वर्ष 1990 में विधान परिषद सदस्य बनने के बाद 1991 में उन्हें दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री बनाया गया। वर्ष 2002 में डेरापुर से विधायक चुने गए। इसके बाद 2007 में दिबियापुर और 2012 में सिकंदरा से चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों चुनावों में उन्हें हार मिली। वर्ष 2013 में सपा सरकार ने उन्हें रेशम विभाग का अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया। 17 मई 2015 को उन्हें फिर विधान परिषद सदस्य बनाया गया।

छह वर्ष से चल रही कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत के इस फैसले से मंजुल और सुधा चौबे हत्याकांड में अब एक महत्वपूर्ण पड़ाव पूरा हो गया है। 10 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद पीड़ित परिवार की लंबी न्यायिक प्रतीक्षा फिलहाल समाप्त हुई है।